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हमारा समाज कैसा हो?

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  हमारा समाज कैसा हो? डॉ. अजय चौधरी एसोसियट प्रोफेसर 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   मानव सभ्यता और राष्ट्र के विकास का सबसे बुनियादी प्रश्न यह होता है कि उसकी समाज व्यवस्था का आधार क्या है। व्यापक धरातल पर देखें तो व्यवस्था के दो रूप प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं—एक प्रकृति-प्रदत्त और दूसरा मानव-निर्मित। प्रकृति ने मनुष्य को एक जैसी शारीरिक बनावट , एक जैसा लाल रक्त और एकसमान बुनियादी जरूरतें देकर इस धरती पर भेजा था ; उसने इंसानों के बीच सीमाएं , जातियां या मजहब नहीं गढ़े थे। लेकिन कालांतर में इंसान ने अपने मानसिक विकास के एक खास पड़ाव पर जिस मानव-निर्मित व्यवस्था को जन्म दिया , उसका आधार उसने धर्म , ईश्वर और पारलौकिक आस्था को बना दिया। यह एक ऐसी विचित्र संरचना सिद्ध हुई , जिसने पहले स्वयं ईश्वर की कल्पना की और फिर समाज की संपूर्ण रचना , विकास और सुख-दुख का सारा दारोमदार भी उसी अज्ञात , अलौकिक शक्ति के मत्थे मढ़ दिया। आज भारतीय समाज इसी धर्मप्रदत्त और पुरोहिती व्यवस्था की जकड़न में बुरी तरह फंसा हुआ नजर आता है। इंसान को इस लोक की वास्तविक भूख , गरीबी , बीमा...

चौखटों पर सवाल बनती चम्पा

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  चौखटों पर सवाल बनती चम्पा डॉ. अजय चौधरी एसोसियट प्रोफेसर 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में जब सत्ता , व्यवस्था और संस्थागत दमन के सम्मुख नेहा बोरा , क्रैसि घोष जैसी मुखर , जुझारू और निर्भीक स्त्रियों के प्रचंड प्रतिरोध का तेवर उभरकर सामने आता है , तो अनायास यह प्रतीति होती है कि कात्यायनी की ‘चम्पा’ अब किसी बंद चौखट या पारिवारिक चारदीवारी के संत्रास से निकलकर सीधे समय के राजनीतिक रणक्षेत्र में उतर आई है। कविता में रूपायित ‘सात भाई’ आज घर की देहरी पर पहरा देने वाले पारंपरिक पितृसत्तात्मक रक्षक होने के बजाय वे राज्य-मशीनरी , दमनकारी पुलिसिया तंत्र , वैचारिक रूढ़िवाद , कॉरपोरेट-सामंती गठजोड़ और चौबीसों घंटे सक्रिय डिजिटल सर्विलांस के वे आधुनिक पहरेदार बन चुके हैं जो किसी भी स्त्री की राजनीतिक मुखरता और स्वायत्तता को अपने वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। जब-जब ये स्त्रियाँ सत्ता के क्रूर कानूनों , जनविरोधी नीतियों और फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ सड़कों , विश्वविद्यालयों और चौराहों पर सीना तानकर खड़ी होती हैं , तो व्यवस्था उन ...

'रश्मीरथी' के 75 वर्ष और कर्ण का आत्ममंथन

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  ' रश्मीरथी ' के 75 वर्ष और कर्ण का आत्ममंथन डॉ . अजय चौधरी एसोसियट प्रोफेसर Mob:8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   रामधारी सिंह ' दिनकर ' का खंडकाव्य अपने रचनाकाल के 75 वें वर्ष के आँकड़े को पार कर प्लैटिनम जुबली में प्रवेश कर गया है। कोई भी रचना जब अपने समय के साथ समकालीनता को समेटे आगे बढ़ती है , तो वह कालजयी रचनाओं में शामिल हो जाती है। आज की वर्तमान स्थिति का आकलन और संघर्ष की जो मिसाल हम देख पाते हैं , वह ' रश्मीरथी ' में पूरी तरह मौजूद है। रचना अपनी प्रासंगिकता तब खो देती है , जब वह समय की सुइयों की होड़ में पीछे रह जाती है। कितनी ही रचनाएँ अपनी प्रासंगिकता खो बैठी हैं , इस बात की चर्चा से आगे बढ़कर अब ' रश्मीरथी ' की प्रासंगिकता और उसके नायक कर्ण के संघर्ष , आत्मचिंतन और आत्ममंथन पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इस रचना पर पहली बार कोई बात रखी जा रही है— इस पर न जाने कितनी आलोचनाएँ और समीक्षाएँ आ चुकी हैं ; फिर भी हर रचना को अपने समय के सापेक्ष देखने का एक नया नज़रिया होता है , जो काल और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।...

गूँगी व्यवस्था और जलते सवाल

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  गूँगी व्यवस्था और जलते सवाल (‘उजला अँधेरा’ की ज़मीनी पड़ताल) डॉ . अजय चौधरी 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   जब कोई कृति अपनी सशक्त विषय-वस्तु के साथ अभिव्यक्ति की एक मौलिक शैली चुनती है , तो वह समकालीन साहित्य में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बना लेती है। कैलाश वानखेड़े का उपन्यास ‘ उजला अँधेरा’ ठीक ऐसी ही रचना है। इस उपन्यास का कथानक , उसका सामाजिक-भौगोलिक परिवेश , लोक-संवेदना से संपृक्त भाषा और सहज-प्रवाहपूर्ण संवाद-शैली के साथ उद्देश्य का जो ताना-बाना बुन गया है, इसे अन्य सामाजिक उपन्यासों से पूरी तरह अलग करते हैं। हम देखते हैं कि अधिकांश सामाजिक उपन्यासों में व्यवस्था और अभावग्रस्त जीवन को बाहर से देखकर , एक दर्शक या विश्लेषक की दृष्टि से चित्रित किया जाता है। इसके विपरीत , इस उपन्यास में कथा का परिवेश उपदेशक की मेज या मंच न होकर शहर से धकियाई गई गंदी बस्तियों , रिसती नालियों , कबाड़खानों और सड़क किनारे टायर के पंचर पकाने वाली खुली दुकानों से आकार लेता है। लेखक ने बारिश में टपकती छतों , घरों में घुसते मटमैले पानी और अभावों के बीच धड़कते मानवीय जीवन को बिना किसी...