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  चौखटों पर सवाल बनती चम्पा डॉ. अजय चौधरी एसोसियट प्रोफेसर 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में जब सत्ता , व्यवस्था और संस्थागत दमन के सम्मुख नेहा बोरा , क्रैसि घोष जैसी मुखर , जुझारू और निर्भीक स्त्रियों के प्रचंड प्रतिरोध का तेवर उभरकर सामने आता है , तो अनायास यह प्रतीति होती है कि कात्यायनी की ‘चम्पा’ अब किसी बंद चौखट या पारिवारिक चारदीवारी के संत्रास से निकलकर सीधे समय के राजनीतिक रणक्षेत्र में उतर आई है। कविता में रूपायित ‘सात भाई’ आज घर की देहरी पर पहरा देने वाले पारंपरिक पितृसत्तात्मक रक्षक होने के बजाय वे राज्य-मशीनरी , दमनकारी पुलिसिया तंत्र , वैचारिक रूढ़िवाद , कॉरपोरेट-सामंती गठजोड़ और चौबीसों घंटे सक्रिय डिजिटल सर्विलांस के वे आधुनिक पहरेदार बन चुके हैं जो किसी भी स्त्री की राजनीतिक मुखरता और स्वायत्तता को अपने वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। जब-जब ये स्त्रियाँ सत्ता के क्रूर कानूनों , जनविरोधी नीतियों और फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ सड़कों , विश्वविद्यालयों और चौराहों पर सीना तानकर खड़ी होती हैं , तो व्यवस्था उन ...
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  ' रश्मीरथी ' के 75 वर्ष और कर्ण का आत्ममंथन डॉ . अजय चौधरी एसोसियट प्रोफेसर Mob:8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   रामधारी सिंह ' दिनकर ' का खंडकाव्य अपने रचनाकाल के 75 वें वर्ष के आँकड़े को पार कर प्लैटिनम जुबली में प्रवेश कर गया है। कोई भी रचना जब अपने समय के साथ समकालीनता को समेटे आगे बढ़ती है , तो वह कालजयी रचनाओं में शामिल हो जाती है। आज की वर्तमान स्थिति का आकलन और संघर्ष की जो मिसाल हम देख पाते हैं , वह ' रश्मीरथी ' में पूरी तरह मौजूद है। रचना अपनी प्रासंगिकता तब खो देती है , जब वह समय की सुइयों की होड़ में पीछे रह जाती है। कितनी ही रचनाएँ अपनी प्रासंगिकता खो बैठी हैं , इस बात की चर्चा से आगे बढ़कर अब ' रश्मीरथी ' की प्रासंगिकता और उसके नायक कर्ण के संघर्ष , आत्मचिंतन और आत्ममंथन पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इस रचना पर पहली बार कोई बात रखी जा रही है— इस पर न जाने कितनी आलोचनाएँ और समीक्षाएँ आ चुकी हैं ; फिर भी हर रचना को अपने समय के सापेक्ष देखने का एक नया नज़रिया होता है , जो काल और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।...
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  गूँगी व्यवस्था और जलते सवाल (‘उजला अँधेरा’ की ज़मीनी पड़ताल) डॉ . अजय चौधरी 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   जब कोई कृति अपनी सशक्त विषय-वस्तु के साथ अभिव्यक्ति की एक मौलिक शैली चुनती है , तो वह समकालीन साहित्य में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बना लेती है। कैलाश वानखेड़े का उपन्यास ‘ उजला अँधेरा’ ठीक ऐसी ही रचना है। इस उपन्यास का कथानक , उसका सामाजिक-भौगोलिक परिवेश , लोक-संवेदना से संपृक्त भाषा और सहज-प्रवाहपूर्ण संवाद-शैली के साथ उद्देश्य का जो ताना-बाना बुन गया है, इसे अन्य सामाजिक उपन्यासों से पूरी तरह अलग करते हैं। हम देखते हैं कि अधिकांश सामाजिक उपन्यासों में व्यवस्था और अभावग्रस्त जीवन को बाहर से देखकर , एक दर्शक या विश्लेषक की दृष्टि से चित्रित किया जाता है। इसके विपरीत , इस उपन्यास में कथा का परिवेश उपदेशक की मेज या मंच न होकर शहर से धकियाई गई गंदी बस्तियों , रिसती नालियों , कबाड़खानों और सड़क किनारे टायर के पंचर पकाने वाली खुली दुकानों से आकार लेता है। लेखक ने बारिश में टपकती छतों , घरों में घुसते मटमैले पानी और अभावों के बीच धड़कते मानवीय जीवन को बिना किसी...
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  फल्गु के कछार से संघर्ष , चेतना और यथार्थ डॉ . अजय चौधरी मोब : 8981031969 ajaychoudharyac@gmail.com   आत्मकथा लिखना एक चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा कार्य है। आत्मकथाकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि जीवन के किन प्रसंगों को दर्ज किया जाए और किसे छोड़ दिया जाए। इसी मोड़ पर उसकी ईमानदारी दांव पर लगती है। व्यक्ति जीवन की कुछ ऐसी व्यक्तिगत घटनाओं और कटु स्मृतियों को मस्तिष्क के किसी कोने में दबाकर रखता है , जिससे दुनिया अनजान होती है। परंतु जब आत्मकथा लेखन का क्षण आता है , तो ये सुप्त स्मृतियां स्वतः स्फूर्त होकर बाहर निकल आती हैं। लेखक का व्यक्तिगत पक्ष जब सार्वजनिक होता है , तो वह एक व्यक्ति की कहानी न रहकर संपूर्ण समाज और समूह के अनुभवों से जुड़कर सत्य की प्रामाणिकता को उजागर करता है।   दलित लेखन में आत्मकथाएँ एक व्यक्ति का स्व-वृत्तांत के रूप में समाज की प्रामाणिक घटना प्रस्तुत करती हैं , जिससे पूरा समाज परिचित हो पाता है। मूल रूप से इसमें समाज द्वारा किए गए उत्पीड़न , अपमान और एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के प्रति निभाई गई अंतर्भावनाओं का प्रत्यक्ष चित्रण होता है। ...