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आँचल की छाँव , संपादक: डॉ. अजय चौधरी

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    रिश्तों के मरुस्थल में संवेदना की शीतल बयार ' आँचल की छाँव ' अर्पणा चौधरी वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाएँ जैसे दम तोड़ती जा रही हैं। आधुनिकता और आपाधापी की अंधी दौड़ में लोग इतने व्यस्त हो चुके हैं कि अपने ही परिवार के लिए समय निकालना दूभर हो गया है। व्यस्तता का आलम यह है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले परिजन कई-कई दिनों तक आपस में संवाद नहीं करते , और यदि बात होती भी है , तो वह केवल औपचारिकता या काम तक सीमित रह जाती है। इस संवादहीनता के कारण परिवार के सदस्यों के बीच की दूरियाँ और खाई दिनों-दिन गहरी होती जा रही हैं। ऐसे विषम और संवेदनहीन समय में माँ के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके असीम संघर्षों को स्मरण करना , हृदय को सच्ची शांति और सुकून प्रदान करता है। आज जहाँ रिश्तों में कड़वाहट और अलगाव घुलता जा रहा है , वहीं पारिवारिक संबंधों को पुन: प्रेम , अपनत्व और आत्मीयता के धागे में पिरोने का स्तुत्य प्रयास डॉ. अजय चौधरी द्वारा संपादित पुस्तक ‘ आँचल की छाँव’ में दिखाई देता है। यह कृति बिखरते रिश्तों में एक बार फिर स्नेह की गर्माहट घोलने का कार्य ...

आपके पत्र मेरे नाम : विजय कुमार तिवारी

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    संवेदनाओं की वापसी और संवाद का पुनर्जीवन   अजय चौधरी Mob: 8981031969 ajaychoudharyakc81@gmail.com   टेक्नोलॉजी के इस आधुनिक दौर में पत्र-लेखन की आदत एक धुंधली स्मृति बनकर रह गई है। विज्ञान और तकनीक ने संपर्क साधने के लिए हमें एक से बढ़कर एक साधन उपलब्ध करा दिए हैं , जिनमें सबसे महत्वपूर्ण और सर्वव्यापी साधन मोबाइल है। जहाँ एक ओर मोबाइल ने मीलों की दूरियों को मिटाकर संबंधों के तार जोड़े हैं , वहीं दूसरी ओर इसने हमारी आत्मिक संवेदना का गहरा ह्रास भी किया है। आज संवेदनाएं मात्र सूचनात्मक होकर रह गई हैं। सगे-संबंधियों से बात करना सिर्फ सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित हो गया है। विडंबना यह है कि आज सभी के हाथ में मोबाइल है , लेकिन अपने ही रिश्तेदारों से जी भरकर बात करने का समय किसी के पास नहीं है। बातें उतनी ही होती हैं , जितने में आवश्यक सूचना साझा हो जाए। परिणामस्वरूप , रिश्तों में जो गहराई और आत्मिक संबंध हुआ करते थे , उनका लोप हो गया है। जब पत्र और चिट्ठियों का दौर था , तब इंसान दूसरे इंसान से मिलने और बात करने के लिए तरस जाता था , उस समय संपर्क का ए...

मिस रमिया (उपन्यास) : कावेरी, समीक्षक: अजय चौधरी

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  पुस्तक: मिस रमिया (उपन्यास) लेखक: कावेरी प्रकाशन: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली वर्ष: 2022 समीक्षक: अजय चौधरी  मूल्य: 395/-    आधुनिक दलित साहित्य में स्त्री विमर्श के नए आयाम’ (कावेरी जी कृत उपन्यास ‘मिस रमिया’ के संदर्भ में)   अजय चौधरी Mob: 8981031969   हिंदी दलित साहित्य के प्रारंभिक दौर में पुरुष रचनाकारों जैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि , मोहनदास नैमिशराय , तुलसी राम आदि का वर्चस्व था। परिस्थितियाँ बदली, समय के साथ महिला साहित्यकारों ने भी अपनी पीड़ा और शोषण गाथा को हथियार बनाकर इस क्षेत्र में अपने होने का एहसास और उपस्थिति दर्ज कराई। उन्हीं नामों में से एक कावेरी जी का भी हैं, जिन्होंने ने ' मिस रमिया ' जैसे उपन्यासों के माध्यम से इस विमर्श में स्त्री के स्वर को मजबूती प्रदान की। इनका स्थान उन गिने-चुने दलित महिला उपन्यासकारों में है , जिन्होंने दलित स्त्री , जातिगत भेदभाव का शिकार के साथ पुरुषवादी मानसिकता, पितृसत्ता के विरुद्ध भी उतनी ही प्रखरता से संघर्ष करती है। इनका महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के दर्शन और नारों को पात्रों के जी...