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अहम बहै दरियाव - शिवमूर्ति

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  भारतीय गाँव के रिसते हुए घावों और अंतहीन संघर्ष का महाकाव्य (उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ के संदर्भ मे  अजय चौधरी  8981031969    शिवमूर्ति की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो गाँव को रोमानियत के चश्मे से नहीं देखते। उनकी कहानियाँ जैसे ‘ तिरिया चरित ’, ‘ कसाईबाड़ा ’ और उपन्यास समाज के उस तल छट को उकेरते हैं जहाँ कानून , संविधान और विकास की किरणें पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। ‘ अगम बहै दरियाव ’ में भी उन्होंने अपनी इसी शैली को विस्तार दिया है , जहाँ उन्होंने व्यवस्था के नग्न सत्य को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। समकालीन हिंदी कथा साहित्य के कथाकार शिवमूर्ति उन सशक्त हस्ताक्षर हैं , जिनकी लेखनी ग्रामीण भारत की नसों में बहते दर्द , संघर्ष और विद्रूपताओं को पूरी ईमानदारी और बेबाकी से पकड़ती है। उनका उपन्यास ‘ अगम बहै दरियाव ’ इसी यथार्थवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। समकालीन हिंदी कथा साहित्य के उन विरले रचनाकारों में से हैं जिनकी कलम गाँव की पगडंडियों से गुजरते हुए वहां की धूल , पसीने और रक्त की गंध को जस का तस कागज़ पर उतार देती है। उनका उपन्...

इस आषाढ़ में : विपिन बिहारी

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  आवांतप और टूटते आषाढ़ के स्वप्न ( ‘इस आषाढ़ में’ पर एक विहंगम दृष्टि ) अजय चौधरी मोबाईल: 8981031969         विपिन बिहारी कृत ‘इस आषाढ़ में’ एक ऐसा आख्यान है जहाँ प्रकृति का ' आवांतप ' ( भट्ठी जैसी गर्मी) मानव जीवन के भीतर और बाहर एक समान फैला हुआ है। यह उपन्यास नहीं , बल्कि एक करुण-गायन है , जो सूखे की रेतीली जमीन पर खड़े होकर आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करती एक दलित बस्ती का जीवंत दस्तावेज रचता है। उपन्यास की शुरुआत आषाढ़ महीने के पिछले पखवाड़े में होती है , जहाँ रात में भी लू का असर है और आसमान “फिटकिरी की तरह” कजल है । कई दिनों से मुंगरी की नींद उड़ी हुई है क्योंकि उसकी कोठरी कुम्हार के आवां (भट्ठी) जैसी महसूस होती है । लगातार सूखे के कारण धान की खेती नहीं हुई है और खेत में धूल उड़ रही है। गाँव में धरती का पानी पाताल छूने लगा है , घर का चापानल (हैंडपंप) सूख गया है , जिससे पूरे टोले की जान सरकारी चापानल पर निर्भर हो गई है। पानी इतना अनमोल हो गया है कि मुंगरी को नहाने के लिए भी मुश्किल से बाल्टी भर पानी मिलता है , और उसे अपनी बेटी स...