आँचल की छाँव , संपादक: डॉ. अजय चौधरी
रिश्तों के मरुस्थल में संवेदना की शीतल बयार ' आँचल की छाँव ' अर्पणा चौधरी वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाएँ जैसे दम तोड़ती जा रही हैं। आधुनिकता और आपाधापी की अंधी दौड़ में लोग इतने व्यस्त हो चुके हैं कि अपने ही परिवार के लिए समय निकालना दूभर हो गया है। व्यस्तता का आलम यह है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले परिजन कई-कई दिनों तक आपस में संवाद नहीं करते , और यदि बात होती भी है , तो वह केवल औपचारिकता या काम तक सीमित रह जाती है। इस संवादहीनता के कारण परिवार के सदस्यों के बीच की दूरियाँ और खाई दिनों-दिन गहरी होती जा रही हैं। ऐसे विषम और संवेदनहीन समय में माँ के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके असीम संघर्षों को स्मरण करना , हृदय को सच्ची शांति और सुकून प्रदान करता है। आज जहाँ रिश्तों में कड़वाहट और अलगाव घुलता जा रहा है , वहीं पारिवारिक संबंधों को पुन: प्रेम , अपनत्व और आत्मीयता के धागे में पिरोने का स्तुत्य प्रयास डॉ. अजय चौधरी द्वारा संपादित पुस्तक ‘ आँचल की छाँव’ में दिखाई देता है। यह कृति बिखरते रिश्तों में एक बार फिर स्नेह की गर्माहट घोलने का कार्य ...