आँचल की छाँव , संपादक: डॉ. अजय चौधरी
वर्तमान समय में मानवीय संवेदनाएँ जैसे दम तोड़ती जा
रही हैं। आधुनिकता और आपाधापी की अंधी दौड़ में लोग इतने व्यस्त हो चुके हैं कि
अपने ही परिवार के लिए समय निकालना दूभर हो गया है। व्यस्तता का आलम यह है कि एक
ही छत के नीचे रहने वाले परिजन कई-कई दिनों तक आपस में संवाद नहीं करते, और यदि बात होती भी है, तो वह केवल औपचारिकता या काम तक
सीमित रह जाती है। इस संवादहीनता के कारण परिवार के सदस्यों के बीच की दूरियाँ और
खाई दिनों-दिन गहरी होती जा रही हैं।
ऐसे विषम और संवेदनहीन समय में माँ के प्रति गहरी
कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके असीम संघर्षों को स्मरण करना, हृदय को सच्ची शांति और सुकून
प्रदान करता है। आज जहाँ रिश्तों में कड़वाहट और अलगाव घुलता जा रहा है, वहीं पारिवारिक संबंधों को पुन:
प्रेम, अपनत्व और आत्मीयता के धागे में पिरोने का स्तुत्य प्रयास डॉ. अजय चौधरी
द्वारा संपादित पुस्तक ‘आँचल की छाँव’ में दिखाई
देता है। यह कृति बिखरते रिश्तों में एक बार फिर स्नेह की गर्माहट घोलने का कार्य
कर रही है।
आज की युवा पीढ़ी, जो आभासी दुनिया और कृत्रिम रिश्तों के आकर्षण में
उलझकर अपने बुनियादी एवं रक्त-संबंधों की अहमियत को भूलती जा रही है, उसके लिए यह पुस्तक किसी वरदान से
कम नहीं है। माँ क्या है? उसकी मूक तपस्या और संघर्षों का स्वरूप क्या है? परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखने में उसका स्थान
कितना केंद्रीय है? इन तमाम सूक्ष्म भावों और पारिवारिक बारीकियों की संजीदगी से पड़ताल करती यह
पुस्तक अपने आप में अद्वितीय है।
इस संकलन में देश के कोने-कोने से विभिन्न पृष्ठभूमि
के लेखकों ने माँ के प्रति अपनी अगाध संवेदनाओं को शब्दों में पिरोया है। स्नेह की
चाशनी में रची-बसी ये रचनाएँ माँ के त्याग और संघर्ष का एक ऐसा जीवंत संसार रचती
हैं, जो हर पाठक के भीतर सुप्त भावनाओं को जगा देता है। ‘आँचल की छाँव’ एक पुस्तक
के रूप में मातृत्व के पावन चरणों में अर्पित एक भावपूर्ण और कालजयी श्रद्धांजलि
है, जो हमें अपनी जड़ों और बुनियादी संस्कारों की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।
पुस्तक की शुरुआत में ही डॉ. बिनय कुमार शुक्ल का यह विचार पाठक के दिल को सीधे
छू लेता है कि “माँ इस
संसार की सबसे पहली और सबसे महान अनुवादक होती है, जो नवजात की अस्पष्ट बड़बड़ाहट, मौन और आंसुओं को भी बिना किसी
शब्दकोश के प्रेम और स्नेह की भाषा में बदल देती है।”
इस पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि
यहाँ माँ को एक काल्पनिक देवी के रूप में महिमामंडित के के बजाय उसके हाड़-मांस, उसके दैनिक संघर्ष, उसके स्वाभिमान और उसके मूक बलिदान
को यथार्थवादी धरातल पर उकेरा गया है। (डॉ. अजय चौधरी के संस्मरण में “जब मिल बंद
हो जाने और पिता की बीमारी के बाद घर में भुखमरी की नौबत आ जाती है, तब एक माँ देहरी लाँघकर कोलकाता के
अनजान कंक्रीट के जंगल में दूसरों के घरों में चौका-बर्तन करती है, ताकि उसके बच्चे पढ़-लिख सकें ।
अभिषेक कुमार भारती के शब्दों में “पच्चीस वर्षों तक
मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी का मल-मूत्र साफ करने वाली और अभावों में भी बच्चों को
सांत्वना देने वाली दलित माँ की व्यथा पाठक को भीतर तक झकझोर देती है। माला वर्मा जी के आलेख में 'शिवानी' के उपन्यासों की मुरीद और आरा की
संस्कृति में बसी संभ्रांत 'अम्मा' की छवि दिखती है, तो माला सिंह के आलेख में लोक कहावतों और भोजपुरी
गीतों से घर को सँवारने वाली जीवंत माँ के दर्शन होते हैं। इस पुस्तक का एक अनूठा पहलू यह भी
है कि इसमें जन्मदात्री माँ के साथ-साथ सासू माँ, नानी-दादी और यहाँ तक कि गुरु को भी मातृत्व के उसी
पवित्र धागे में पिरोया गया है।
एक बात साफ कहूँ तो पुस्तक की
भाषा में बनावटीपन या पांडित्य का बोझ नहीं है। यहाँ हर लेखक ने अपनी मातृभाषा की
महक—कहीं भोजपुरी की मिठास, कहीं संस्कृत के श्लोक, तो कहीं रोज़मर्रा की बोलचाल के साथ अपनी आत्मा उड़ेल दी है। जब अंजुल
श्रीवास्तव लिखती है कि—“छूट गया
ममता का आँचल, ये दर्द कहाँ उकेरूँ माँ / बिन माँ के मायका भी बोलो, बेटियों को भाता है क्या...” तो पाठक की आँखें बरबस भीग उठती
हैं। यह पुस्तक पढ़ते समय ऐसा लगता है कि
आपके अपने घर का आँगन, आपकी अपनी माँ की साड़ी का पल्लू और उनका लाड़-दुलार आपके सामने साकार हो उठा
है।
आज की युवा पीढ़ी, जो वर्चुअल दुनिया के क्षणिक रिश्तों में उलझकर
माँ-बाप के ऋण को बिसराती जा रही है, उसके लिए ‘आँचल की छाँव’ एक जाग्रत दर्पण और संजीवनी की तरह है। हम दुनिया में
चाहे जितनी भी सफलता पा लें, लेकिन जब ज़िंदगी की धूप झुलसाने लगेगी, तो सुकून केवल और केवल उसी 'आँचल की छाँव' में मिलेगा। यदि आप भागदौड़ और मानसिक तनाव के
बीच अपनी आत्मा को थोड़ा सुकून देना चाहते हैं और माँ के उस असीम त्याग को पुनः
महसूस करना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपकी निजी लाइब्रेरी और आपके दिल में रहने योग्य है। एक पंक्ति में कहूँ तो रिश्तों के
मरुस्थल में वात्सल्य, कृतज्ञता और संवेदना की सबसे भीगी हुई छाँव।
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