सरप्राइज और लड़की (कहानी-संग्रह) : कृष्ण कुमार भगत

पुस्तक: सरप्राइज और लड़की (कहनी-संग्रह)

लेखक: कृष्ण कुमार भगत

प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली

वर्ष: 2025

समीक्षक: अजय चौधरी

मूल्य: 250/- 

 

यथार्थ की ज़मीन पर रिश्तों और व्यवस्था का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

 

अजय चौधरी

8981031969

 साहित्य की सभी विधाओं में 'कहानी' मानव जीवन और समाज के नब्ज पकड़ने के साथ संवेदनाओं के सबसे निकटतम होने के कारण सर्वोपरि विधा के रूप में स्वीकार किया गया है। कहानी अब मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा है, यह समाज के मौजूदा हालात की यथार्थ  तस्वीर बयां करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इस विधा की असली शक्ति उसकी संवेदना और यथार्थवाद में निहित है। यह पात्रों के सुख-दुख और उनके मानसिक अंतर्द्वंद्व से इस कदर जोड़ देती है कि वह स्वयं को कथा का हिस्सा महसूस करने लगता है। देखा जाता है कि सामाजिक चेतना जागृत करने में कहानी एक अमोघ अस्त्र की तरह काम कर रही है। वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियों पर, प्रशासनिक संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के लिए कहानी एक कारगर हथियार का कार्य करती है।

कहानी संग्रह ‘सरप्राइक और लड़की’ के लेखक की पहली पहचान उनकी आत्मकथा 'सन ऑफ दा त्रिवेणी दास भगत' से बनी, जो  साहित्य में सामाजिक न्याय और दलित चेतना की नींव रखती है। साहित्य जगत में वे एक ऐसे कहानीकार के रूप में स्थापित हैं जो ग्रामीण विसंगतियों को उजागर करते हैं, जैसे 'परमाण पत्तर' में गरीब की बेबसी, सत्ता के विद्रूप चेहरे को बेनकाब करते हैं, 'शाबाश मधु' और 'सरप्राइज और लड़की' में भी देखा जा सकता है। लेखक महिला अस्मिता और उनके संघर्ष को केंद्रीय स्थान देते हैं। वे न केवल ग्रामीण कथाकार के रूप में सामने आते हैं, उनकी पारखी नजर महानगरीय विद्रूपताओं जैसे 'आखिरी सफर' और 'पॉकेटमार' का भी परख करते हैं। वे आधुनिक तकनीक फेसबुक, नेट और उसके कारण उपजे मानवीय अकेलेपन को साहित्य का विषय बनाकर समकालीन बोध के साथ भी जुड़ते हैं।

इनकी कहानियाँ 'सत्य के अन्वेषण' और 'मानवता के पक्षधर' के रूप में सदैव अडिग रहा है, इस कहानी-संग्रह में कुल 16 कहानियाँ संकलित हैं, जो समाज के विभिन्न वर्गों, संवेदनाओं और विसंगतियों को प्रकाश में लाने का काम करती हैं। इनकी कहानियाँ समाज के उन कोनों को प्रकाशित करती हैं जहाँ प्रायः अंधेरा छाया रहता है। इस संग्रह की पहली कहानी ‘दिल्लगी’ में कल्पना के मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व से शुरू होती है। जब उसका पुराना प्रेमी कमल घर आता है, तो वह चाय बनाते समय भी कांप रही होती है। वह अतीत की यादों को एक अपराध की तरह देखती है। राजीव के आने पर जब कमल और राजीव एकांत में बात करते हैं, तो कल्पना का डर चरम पर होता है। अंत में राजीव का हँसते हुए यह कहना कि "कमल मेरा पुराना दोस्त है और उसने मुझे शादी से पहले ही सब बता दिया था", पूरी कहानी को एक सुखद मोड़ देता है। यह कहानी पुरुष के उस उदार स्वरूप को दिखाती है जो स्त्री के अतीत को स्वीकार करने का साहस रखता है। यह वैवाहिक जीवन में 'सच' की ताकत और संकीर्ण सोच से मुक्ति का संदेश देती है। वहीं ‘तुच्छ’ कहानी में  सुनील एक मध्यमवर्गीय अहंकारी पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो किसी महिला के चरित्र का फैसला उसके कपड़ों और मिलने-जुलने से करता है। वह अपनी पत्नी की सहेली सीमा को हेय दृष्टि से देखता है। क्लाइमेक्स में खुलासा होता है कि सीमा ने स्वयं को एक बदनामी की आग में झोंक दिया था ताकि सुनील की नौकरी और प्रतिष्ठा बच सके। यह कहानी  उस 'नैतिकता के पाखंड' पर प्रहार करती है, जिसे समाज 'तुच्छ' समझता है, कभी-कभी वही सबसे बड़ा त्यागी होता है।

यह एक 'लॉन्ग शॉर्ट स्टोरी' है जो केरल से उत्तर भारत तक नीलम्मा के सफर को दिखाती है। वह एक समर्पित ए.एन.एम. नर्स है, लेकिन उसका निजी जीवन रूपेश शर्मा द्वारा शोषण और सामाजिक तिरस्कार की भेंट चढ़ जाता है। हेमंत के साथ उसका विवाह एक राहत की तरह आता है, लेकिन धर्म और समाज की दीवारें उसे ताउम्र चैन नहीं लेने देतीं। ‘नीलम्मा’ कहानी  कामकाजी महिला के शोषण और उसकी पहचान के संकट की मार्मिक गाथा है, जो सेवा भाव के बावजूद भी समाज एक अकेली महिला के प्रति कितना क्रूर हो सकता है।

होशियार सिंह एक चालाक सवर्ण मानसिकता का व्यक्ति है जो अपनी पत्नी लाडो को केवल इसलिए चुनाव लड़ाता है ताकि 'आरक्षण' का लाभ उठाकर वह खुद 'प्रधान' बना रहे। लाडो, जो पहले केवल घूँघट में रहती थी, धीरे-धीरे विकास कार्यों की फाइलों को समझने लगती है। जब वह भूमिहीन दलितों को पट्टे बांटने का निर्णय लेती है, तो वह वास्तव में अपने पति की सत्ता को उखाड़ फेंकती है। ‘लाडो जग उठी’ कहानी 'मुखिया पति' संस्कृति पर सीधा हमला है और जमीनी स्तर पर दलित-महिला सशक्तीकरण की घोषणा भी है। सरकारी और चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता को ‘परमाण पत्तर’ कहानी  उघाड़ती है। एक गरीब व्यक्ति के लिए मरना भी कितना अपमानजनक हो सकता है। इस कहानी में करतार की मृत्यु एक मानवीय त्रासदी है, लेकिन तंत्र के लिए वह केवल एक आंकड़ा है। उसका भाई सरबजीत डॉक्टर कपूर के सामने गिड़गिड़ाता है क्योंकि बिना प्रमाण पत्र के उसे बैंक का कर्ज और बीमा नहीं मिलेगा। डॉक्टर की संवेदनहीनता इतनी है कि वह दुःख की घड़ी में भी अपनी 'विजिटिंग फीस' और नियमों की दुहाई देता है।

‘बल’ कहानी में चम्पा एक ऊँची जाति की लड़की है और प्रणय एक विस्थापित दलित परिवार का युवक। दोनों की प्रेम कहानी कुमाऊँ की पहाड़ियों के बीच पनपा सामाजिक जकड़न को तोड़ता है। 'बल' शब्द का प्रयोग स्थानीय संस्कृति के पुट को गहरा करता है। पिता का हृदय परिवर्तन कहानी को सकारात्मक अंत देता है। यह कहानी जातिवाद के विरुद्ध मानवीय प्रेम की प्रतिष्ठा करती है और विस्थापितों के प्रति सहानुभूति का भाव जगाती है।

‘नेट’ में अंशुमामा की कहानी आधुनिक पारिवारिक स्वार्थ की पराकाष्ठा है। जिस घर को उन्होंने खून-पसीने से सींचा, उनके ससुराल वालों और अपनों ने उन्हें वहीं से बेदखल कर दिया। मामा अब एक छोटे कमरे में मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से अपनी दुनिया को खोजने का प्रयास करता हैं। यह बुजुर्गों के परित्याग और डिजिटल दुनिया के 'छद्म सहारे' की ओर संकेत करती है। जब परिवार के लोगों का साथ छूट जाता है तो वह नेट की दुनिया से संबंध बनाकर अकेपन को दूर करने का प्रयास करता है, जो वायवीय साबित होता है। वहीं दूसरी ओर ‘फेसबुक’ की आभासी दुनिया की कहानी है।  इस कहानी  के जगत नारायण देव के पास धन-संपत्ति सब है, बस 'समय' देने वाला कोई नहीं है। उनके फेसबुक पर हजारों दोस्त हैं जो उनके जन्मदिन पर वॉल भर देते हैं, लेकिन उनके घर की घंटी नहीं बजती। वे आभासी दुनिया की तालियों के बीच वास्तविक सन्नाटे को महसूस करते हैं। यह आधुनिक अकेलेपन का मनोविज्ञान है। यह कहानी दर्शाती है कि 'लाइक' और 'कमेंट' कभी भी मानवीय स्पर्श का स्थान नहीं ले सकते।

यात्रा के दौरान मिले हातिम के माध्यम से लेखक जीवन की चंचलता को दिखाते हैं। कहानी अचानक मुड़ती है और नोटबंदी के समय उन लोगों की याद दिलाती है जो अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए कतारों में खड़े-खड़े दुनिया छोड़ गए। यह कहानी सत्ता के तुगलकी फैसलों के कारण होने वाली आम आदमी की 'अनाम मौतों' का शोकगीत है। वही सत्ता का दुसरा रूप ‘पॉकेटमार’ में देख सकते हैं, कहानीकार प्रतीक के जरिए राजनीति का यथार्थ नग्न को प्रकाश में लाया है। एक बच्चा प्रधानमंत्री की पत्थर की मूर्ति में 'जेब' न पाकर बेचैन है। वह उसमें प्लास्टिक की थैलियां चिपकाता है। अभाव से बच्चा मर जाता है, लेकिन व्यवस्था वैसी ही रहती है। अंत में लेखक का बटुआ चोरी होना यह दिखाता है कि असली पॉकेटमार व्यवस्था के भीतर ही घूम रहे हैं। यह कहानी प्रतीकात्मक राजनीति पर कड़ा व्यंग्य है। जब तक जनता की जेब खाली है, मूर्तियों का निर्माण एक क्रूर मजाक है। ‘शाबाश मधु’ में  मधु का पति बेरोजगार है। जब वह शिक्षा मंत्री से मदद मांगने जाती है, तो मंत्री उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता है। वह उसे पाँच लाख रुपये देकर चुप रहने को कहता है। मधु उन रुपयों को ठुकराकर पुलिस और कानून का रास्ता चुनती है। यह नारी की चारित्रिक दृढ़ता और सत्ता के अहंकार के पतन की कहानी है।

इस संग्रह की केन्द्रीय कहानी ‘सरप्राइज और लड़की’ है। गरिमा एक ऐसी लड़की है जो विदेश में रहकर भारत को महान समझती है। वह अपने पिता भूपति सिंह को एक 'आदर्श पिता' मानती है। लेकिन एक ही रात में वह जिस हिंसा और भ्रष्टाचार को देखती है, वह उसे तोड़ देता है। जब उसे पता चलता है कि उसका पिता ही अपराधियों का रक्षक है, तो वह पिता की ही पिस्टल से खुद को खत्म कर लेती है। यह आदर्शवाद की हत्या और राजनीतिक अपराधीकरण का वीभत्स चित्रण है। यह 'बेटी बचाओ' जैसे नारों के पीछे के खोखलेपन को उजागर करती है। ‘जहर दवा’ वृद्ध माँ को बोझ समझने वाले बेटों की कहानी है। वे वार्ड बॉय को घूस देते हैं कि उसे जहर का इंजेक्शन दे दे। माँ, जिसे लग रहा है कि उसे ठीक करने की दवा दी जा रही है, अपनी प्रचंड जीने की इच्छा से उस जहर को भी मात दे देती है। यह कहानी घटते नैतिक मूल्यों और माँ की अजेय ममता व जिजीविषा का मार्मिक चित्रण है।

‘प्रेम-कथा’ यह 'बल' के पात्रों का विस्तार है। प्रणय को पुलिस एक झूठे केस में जेल डाल देती है। चम्पा, जो कभी कोमल लड़की थी, अब एक योद्धा की तरह वकील और सिस्टम से लड़ती है। यह कहानी पुलिसिया उत्पीड़न और एक स्त्री के संघर्षपूर्ण प्रेम की जीत है। किसानी संवेदना पर आधारित ‘खुला पत्र’ एक लेखक अपनी आत्मिक पीड़ा लिखता है। वह बताता है कि कैसे एक किसान को कर्ज मार देता है और एक लेखक को उपेक्षा। वह पत्र शैली में समाज के उन अंगों पर प्रहार करता है जो किसानों की आत्महत्या पर मौन रहते हैं। यह कहानी  किसानों की व्यथा और बौद्धिक समाज की विफलता का आईना है। इस संग्रह की अंतिम कहानी ‘नया रिश्ता’ है। इस कहानी में शेखर को लगता है कि उसकी पत्नी मानसी का रवि के साथ चक्कर है। वह रवि के पत्रों को पकड़ लेता है। बाद में उसे पता चलता है कि वह केवल भाई-बहन जैसा पवित्र रिश्ता था। अपनी गलती सुधारने के लिए वह अपनी विधवा बहन की शादी रवि से कराता है। यह कहानी विधवा विवाह का समर्थन करती है और रिश्तों में बढ़ते अविश्वास को संवाद से सुलझाने की प्रेरणा देती है।

यह कहानी संग्रह महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और व्यवस्था की विसंगतियों का महत्वपूर्ण संकलन है। संग्रह में 'शाबाश मधु' और 'लाडो जाग उठी' जैसी कहानियाँ शोषित महिलाओं के अदम्य साहस और ग्रामीण राजनीति में उनकी बदलती भूमिका को रेखांकित करती हैं, जो 'पति-प्रधान' व्यवस्था को चुनौती देकर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करती हैं। वहीं, 'नीलम्मा' कामकाजी महिलाओं के सामाजिक संघर्षों और उनकी सुरक्षा से जुड़ी जटिलताओं को मार्मिकता से प्रस्तुत करती है। 'परमाण पत्तर' और 'सरप्राइज और लड़की' के माध्यम से प्रशासनिक संवेदनहीनता, भ्रष्टाचार और राजनीति के उस भयावह चेहरे को उजागर किया है, जहाँ आम आदमी न्याय के लिए भटकने को विवश है। 'पॉकेटमार' जैसी रचनाएँ देशप्रेम के खोखलेपन और व्यवस्था की उन कमियों पर चोट करती हैं जहाँ आम आदमी की श्रद्धा का भी शोषण होता है। आधुनिक जीवन के मनोवैज्ञानिक यथार्थ को दर्शाते हुए 'फेसबुक' और 'नेट' जैसी कहानियाँ दिखाती हैं कि तकनीक ने संवाद तो बढ़ाया है, लेकिन मनुष्य के भीतर का अकेलापन और रिश्तों की ऊष्मा कम कर दी है। इसके साथ ही, 'नया रिश्ता' और 'दिल्लगी' वैवाहिक जीवन में पारदर्शिता, विश्वास और विधवा-विवाह जैसी प्रगतिशील सोच की वकालत करती हैं। 'खुला पत्र' के माध्यम से एक साहित्यकार-किसान की आर्थिक चुनौतियों और अंतर्द्वंद्व को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। संग्रह की अन्य कहानियाँ, जैसे 'जहर-दवा', उपभोक्तावादी समाज में नैतिक पतन और बुजुर्गों की उपेक्षा को दर्शाती हैं। अंततः, यह संग्रह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानवीय गरिमा, सत्य और जिजीविषा को बनाए रखने का संदेश देता है। लेखक ने सूक्ष्मता से यह स्थापित किया है कि नैतिक मूल्यों की ओर वापसी और व्यवस्था के प्रति नागरिक जिम्मेदारी ही वर्तमान समाज के संकटों का वास्तविक समाधान है।

लेखक ने कहानी को प्रभावी बनाने के लिए भाषा को सरल, सहज और पात्रों के परिवेश के अनुकूल गूँथा है। इस संग्रह में खड़ी बोली हिंदी के साथ-साथ उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी और स्थानीय बोलियों को मिश्रण किया है, जो कहानियों को यथार्थवादी धरातल के करीब लाकर खड़ा कर देती है। भाषा में तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का संतुलित प्रयोग मिलता है। जहाँ एक ओर 'प्रस्तर प्रतिमा', 'नतमस्तक' और 'कृतघ्न' जैसे शब्दों का प्रयोग भाषा को गंभीर बनाता है, वहीं दूसरी ओर 'मजलिस', 'औपचारिकता', 'साभिवादन' और 'हिकारत' जैसे उर्दू शब्दों का प्रयोग संवादात्मकता को बढ़ाता है। लेखक ने आधुनिक संदर्भों को स्पष्ट करने के लिए अंग्रेजी शब्दों जैसे 'व्हाट्स एप्प', 'फेसबुक', 'लैपटॉप', 'सैट', 'ई-रिक्शा' और 'लिव-इन रिलेशनशिप' का भी बेझिझक जगह दिया है, जो आज की पीढ़ी और शहरी जीवन की वास्तविकता को अंधेरे के गुफा से बहार निकलता है।

 कहानियों में वर्णनात्मक और संवादात्मक दोनों शैलियों का प्रयोग हुआ है। लेखक ने प्रथम पुरुष में कहानियों को कहा है जैसे 'तुच्छ', 'नेट' और 'आखिरी सफर' में, जिससे पाठक सीधे कथाकार से जुड़ाव महसूस करता है। भाषा में कहीं-कहीं काव्यता भी दिखाई देती है, विशेषकर प्रकृति चित्रण या भावनात्मक दृश्यों में, जैसे 'फेसबुक' कहानी में डूबते सूर्य और ओस की बूंदों का वर्णन। इसके विपरीत, 'खुला पत्र' कहानी को पत्रात्मक शैली में लिखा गया है, जो पात्र की आंतरिक पीड़ा और संवेदना को व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस संग्रह की भाषा आम आदमी की भाषा है जो सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करने के लिए कहीं तल्ख और कहीं अत्यंत संवेदनशील हो जाती है।

कहानी का शीर्षक प्रथमद्रष्टा में रोचक और विस्मय करने जैसा लगता है। पर जैसे-जैसे कहानी की परतें खुलती है वैसे- वैसे शीर्षक के अंदर छिपे संवेदनाएँ और भाव सामने आने लगता है। इसका शीर्षक 'सरप्राइज और लड़की' अर्थपूर्ण और सोद्देश्य है। यह शीर्षक संग्रह की बारहवीं कहानी से लिया गया है। लेखक ने स्वयं 'दो शब्द' में उल्लेख किया है कि आकार में छोटी होने के बावजूद यह शीर्षक रचना समाज के मौजूदा हालात की एक मुकम्मल तस्वीर बयां करती है। कहानी में 'सरप्राइज' शब्द का प्रयोग गरिमा द्वारा अपने परिवार को अचानक मिलने की योजना के रूप में शुरू होता है, लेकिन व्यवस्था की सड़ांध और पिता के असली चेहरे को जानकर यह 'सरप्राइज' एक भयानक त्रासदी में बदल जाता है। इस शीर्षक में एक गहरा व्यंग्य भी छिपा है। सामान्यतः 'सरप्राइज' शब्द खुशी का अहसास कराता है, लेकिन इस संग्रह में यह शब्द शोषण, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के खुलासे के साथ सामने आता है। 'लड़की' यहाँ समाज की उस इकाई का प्रतिनिधित्व करती है जिस पर इस व्यवस्था का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। अतएव,'सरप्राइज और लड़की' संग्रह अपनी विषयवस्तु और संवेदनाओं के कारण वर्तमान समय का दर्पण बन गया है।

इनकी कहानियों को पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो संवेदनाओं की छोटी-छोटी अनुभूतियों को सहेजने के लिए लेखक ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वे अनुभव की भट्टी में तपकर गाढ़े हो गए हों। उनकी सारी कहानियाँ ऐसी भावनाओं के साथ गुँथी हुई हैं कि उन्हें सहजता से बीनकर छाँटना मुश्किल हो जाता है। यह संग्रह ऐसे  कई कहानियों का संकलन है, जो अलग-अलग पृष्ठभूमियों पर लिखी गई हैं। सहज कथानक के साथ लेखक संवेदनाओं की अनुभूतियों में ऐसे गोते लगाते हैं कि हाथ में मोतियों सी चमत्कृत करने वाले उत्कर्ष  होता है। इनकी सारी कहानियाँ चाहे 'दिल्लगी' हो, 'पॉकेटमार' हो या 'फेसबुक' या कहानी-संग्रह की शीर्षक वाली कहानी पढ़नेवाले को एक ऐसे भावनात्मक मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं कि वह कई दिनों तक उस प्रभाव या सदमे से उबर नहीं पाता है।

           किसानी प्रवृति के धनी लेखक की कहानी संग्रह ‘सरप्राइज और लड़की’ ऐसे समय में एक साहित्यिक सेतु काम कर रही है जो अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के संघर्षों और भविष्य की संभावनाओं को एक सूत्र में पिरोकर समाज को नई दिशा प्रदान करने की क्षमता रखती है। वे स्वयं को एक सीमांत किसान और लेखक के रूप में देखते हैं। वे मुंशी प्रेमचंद का उल्लेख करते हुए इस बात पर बल भी देते हैं कि यथार्थ को केवल देखने और उसे भोगने में बहुत अंतर होता है। साहित्य जगत में उनका स्थान उन लेखकों में है जो ग्रामीण जीवन के रिसते हुए घावों को बिना किसी बनावट के प्रस्तुत करते हैं। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक कृति भी है जो समाज की अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाने का प्रयास करती है।



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