संवेदनाओं की वापसी और संवाद का पुनर्जीवन
अजय चौधरी
Mob: 8981031969
ajaychoudharyakc81@gmail.com
टेक्नोलॉजी के इस आधुनिक दौर में पत्र लेखन की आदत एक
धुंधली स्मृति बनकर रह गई है। विज्ञान और तकनीक ने संपर्क साधने के लिए हमें एक से
बढ़कर एक साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनमें सबसे
महत्वपूर्ण और सर्वव्यापी साधन मोबाइल है। जहाँ एक ओर मोबाइल ने मीलों की दूरियों
को मिटाकर संबंधों के तार जोड़े हैं, वहीं दूसरी ओर
इसने हमारी आत्मिक संवेदना का गहरा ह्रास भी किया है। आज संवेदनाएं मात्र
सूचनात्मक होकर रह गई हैं। सगे-संबंधियों से बात करना सिर्फ सूचनाओं के
आदान-प्रदान तक सीमित हो गया है। विडंबना यह है कि आज सभी के हाथ में मोबाइल है, लेकिन अपने ही रिश्तेदारों से जी भरकर बात करने का समय किसी
के पास नहीं है। बातें उतनी ही होती हैं, जितने में
आवश्यक सूचना साझा हो जाए। परिणामस्वरूप, रिश्तों में
जो गहराई और आत्मिक संबंध हुआ करते थे, उनका लोप हो
गया है। जब पत्र और चिट्ठियों का दौर था, तब इंसान
दूसरे इंसान से मिलने और बात करने के लिए तरस जाता था, उस समय संपर्क का एकमात्र साधन चिट्ठी या पत्र ही हुआ करता
था। उन चिट्ठियों में स्याही नहीं होती थी,शब्द के रूप
में भाव बोला करते थे। उनमें आत्मीयता कूट-कूट कर भरी रहती थी। जब किसी के घर
डाकिया चिट्ठी लेकर आता था,
तो वह कागज का टुकड़ा, उस व्यक्ति की मौजूदगी का जीवंत
एहसास होता था।
समय बदला, चिट्ठी-पत्री का दौर
बदला,
और सूचनाओं व आत्मिक बातों के आदान-प्रदान के साधन भी बदल
गए। आज इंसान,
इंसान से दूर चला जा रहा है और आत्मीय संबंध महज डिजिटल
डाटा या सूचना में तब्दील हो गए हैं। ऐसे संवेदनहीन समय में विजय कुमार तिवारी की पुस्तक
‘आपके पत्र मेरे नाम’ एक ऐसे मील के पत्थर के रूप में सामने आई है, जिसने वर्तमान में चिट्ठी-पत्री को लेकर उत्पन्न हुई शंकाओं को ध्वस्त कर दिया
है और एक सूखी हुई नदी में पुनः जलधारा प्रवाहित करने का भगीरथ प्रयास किया है।
विजय कुमार तिवारी द्वारा संपादित और लिखित यह पुस्तक हिंदी
साहित्य की एक लुप्तप्राय होती विधा ‘पत्र साहित्य’ को पुनर्जीवित करने का एक अनुष्ठान है, जिसे लेखक ने ‘पत्र-लेखन
यज्ञ’
की संज्ञा दी है। इस पुस्तक की नींव 17-18
दिसंबर 2024 को पड़ी, जब लेखक के मन में अनायास ही यह विचार आया कि आज के
साहित्यकार और समाज पत्र लेखन से विमुख क्यों हो गए हैं। इस विचार को मूर्त रूप
देने के लिए विजय जी ने सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से देश और
दुनिया के साहित्यकारों के नाम एक ‘खुला पत्र’ लिखा। उनका आह्वान स्पष्ट था, आइए, हम फिर से पत्र लिखना शुरू करें। इस आह्वान का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि बहुत कम समय में
उन्हें देश-विदेश के वरिष्ठ और युवा साहित्यकारों, गृहणियों,
और चिंतकों के असंख्य पत्र प्राप्त हुए। यह पुस्तक उन्हीं
पत्रों और विजय जी द्वारा दिए गए उनके आत्मीय उत्तरों का एक कुंजिका है।
इस पुस्तक में संकलित पत्र सिर्फ कुशल-क्षेम पूछने वाले
पत्र नहीं हैं, ये पत्र वर्तमान साहित्य, समाज की दशा, लेखकों के
अंतर्विरोध और मानवीय पीड़ाओं का कच्चा चिट्ठा हैं। लेखक ने अपने खुले पत्र में साहित्यकारों से कुछ तीखे
प्रश्न पूछे थे,
जैसे- ‘हम क्यों लिखते हैं?’, ‘किसके लिए लिखते हैं?’,
और ‘क्या साहित्यकार जो लिखते हैं, उसे जीते भी हैं?’। इन प्रश्नों
के उत्तर में जो पत्र आए,
वे इस पुस्तक की आत्मा हैं।
पुस्तक में कई पत्र साहित्य की वर्तमान स्थिति पर गंभीर
चिंता व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, डॉ. मुकेश
असीमित अपने पत्र में लिखते हैं कि आज साहित्य ‘बाजारवाद’
की चपेट में है और उसमें आत्मीयता की कमी हो गई है। सोशल
मीडिया ने लेखकों को मंच तो दिया है, लेकिन
लोकप्रियता की दौड़ में गंभीरता समाप्त हो रही है। वहीं, राजा सिंह, लखनऊ से अपने पत्र में निर्मल वर्मा और कमलेश्वर
को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि आज का लेखन दिल से नहीं, दिमाग से हो रहा है, जिसका
उद्देश्य केवल पुरस्कार और प्रसिद्धि पाना है। इन पत्रों के माध्यम से यह पुस्तक
आज के साहित्यिक परिवेश की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। गुटबाजी, मठाधीशी और ‘लुगदी साहित्य’ ने गंभीर सृजन को हाशिए पर धकेल दिया है। फिर भी, विजय जी अपने उत्तरों में निराशा को हावी नहीं होने देते। वे मानते हैं कि साहित्य में हमेशा एक अंतर्धारा बहती रहती
है जो कचरे को किनारे कर देती है और श्रेष्ठ को बचाए रखती है।
इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा ‘नॉस्टेल्जिया’ से भरा है।
गिरीन्द्र कुमार पाण्डेय का पत्र पाठकों को भावुक कर देता है, जब वे याद करते हैं कि कैसे उनके बाबूजी ने परदेस से पहली
बार पत्र लिखा था। वे लिखते हैं कि हमारी पीढ़ी उन अनुभूतियों की आखिरी गवाह है, जब डाकिया के आने पर पूरा मोहल्ला पूछ बैठता था, ‘हमारी
चिट्ठी भी है क्या?’। सुधांशु शेखर पाठक, धनबाद से अपने पत्र में बताते हैं कि कैसे उन्होंने 1965 में अपने पिता को लिखा गया पोस्टकार्ड और अपनी पत्नी व मामी
के पत्रों को आज भी धरोहर की तरह सहेज कर रखा है। वे प्रश्न उठाते हैं कि क्या आज
के डिजिटल टेक्स्ट मैसेज में वो गंध और वो स्पर्श महसूस किया जा सकता है जो पुराने
अंतर्देशीय पत्रों में था?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं। विजय जी इस पुस्तक के माध्यम से इसी ‘स्पर्श’ को लौटाना चाहते हैं।
इस संग्रह की एक बड़ी विशेषता इसमें शामिल महिलाओं के पत्र
हैं। ये पत्र किसी नारीवादी आंदोलन के नारे नहीं, भारतीय समाज में स्त्री के यथार्थ और उसके मौन संघर्ष की कहानियां हैं। सुमन
झा ‘माहे’ गोरखपुर से अपने पत्र
में समाज में आए बदलावों और टूटते परिवारों पर चिंता व्यक्त करती हैं। वे लिखती
हैं कि आज ‘शर्म और डर’ खत्म हो गया
है और माता-पिता अपनी बेटियों के ससुराल में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं, जिससे रिश्ते टूट रहे हैं।
दूसरी ओर, डॉ. रंजना जायसवाल और माला वर्मा के पत्र स्त्री की जिजीविषा को दर्शाते हैं। रंजना जी लिखती हैं कि कैसे शादी के बाद ‘पेन और कागज की जगह बेलन और चकले ने ले ली थी’, लेकिन उन्होंने अपने भीतर के लेखक को मरने नहीं दिया। माला
वर्मा का पत्र,
जो इस संग्रह का सबसे विस्तृत पत्र है, एक पूरा जीवन-वृतांत है। वे बताती हैं कि कैसे उन्होंने पत्र-लेखन से ही अपनी
साहित्यिक यात्रा शुरू की और कैसे पुत्र-वियोग के असहनीय दुख से उबरने में उनकी
कलम ने सहारा दिया। इस पुस्तक को पढ़ने के
क्रम में जब मेरी दृष्टि उनके पत्र पर पड़ी, तो
मैं उससे भावनात्मक रूप से गहराई तक जुड़ गया। उनका पत्र पढ़ते समय ऐसा प्रतीत हो
रहा था मानो वे अतीत के महासागर में गोते लगाते हुए अपने जीवन की एक-एक घटना को
सिलसिलेवार जी रही हैं। उनके लेखन का प्रभाव इतना जीवंत था कि पढ़ते वक्त मुझे ऐसा
महसूस हुआ जैसे मैं महज एक पाठक के रूप में उन घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी हूँ और
उसी समय-काल में उनके साथ मौजूद हूँ। उनके पत्र में जीवन के विविध रंगों का जो
समावेश है, वह अद्भुत है। बचपन और पढ़ाई के दिनों की यादें,
विवाह के समय एक पिता द्वारा बेटी की मर्जी पूछने का भावुक क्षण,
और सबसे विशिष्ट विवाह में पिताजी द्वारा दहेज के रूप में साहित्यक
धरोहर ‘पत्रिका’ भेंट करना, यह सब कुछ
अत्यंत प्रेरक है। पत्रों के माध्यम से देश के मूर्धन्य साहित्यकारों से उनके
संपर्क और संवाद का विवरण पढ़ना एक सुखद आश्चर्य था। मायके की निश्छलता से लेकर
ससुराल की जिम्मेदारियों तक, और घर-परिवार के विभिन्न
प्रसंगों से लेकर व्यक्तिगत जीवन में आई भारी उथल-पुथल तक हर एक घटना का ब्यौरा
इतनी ईमानदारी से दिया है कि सारी घटनाएं किसी चलचित्र की भाँति मेरी आँखों के
सामने तैरने लगीं। विशेषकर जीवन के कठिन दौर का वर्णन करते समय उनकी लेखनी ने पाठक
को स्तब्ध कर दिया। उनकी लेखनी में अद्भुत धार और प्रवाह है। ‘विवरणात्मकता’ उनकी शैली की सबसे बड़ी शक्ति है। मन
की बातों और दबी हुई भावनाओं को शब्दों के माध्यम से जिस कैनवास पर उकेरा है,
उसमें उनकी सारी स्मृतियां सजीव हो उठी हैं। यह पत्र एक कागज का
टुकड़ा के रूप में एक स्त्री के संघर्ष, जिजीविषा और
साहित्यिक यात्रा का एक आयाम है।
यह पुस्तक भारतीय लेखकों तक सीमित नहीं है। इसमें मॉरिशस के
वरिष्ठ साहित्यकार रामदेव धुरंधर का पत्र भी शामिल है। रामदेव जी का पत्र लेखन के
उद्देश्य पर एक दार्शनिक चिंतन है। वे एक घटना का जिक्र करते हैं जहाँ एक व्यक्ति
ने पूरी ‘रामायण’ अपने लिए लिखी और उसे
कभी छपवाया नहीं,
क्योंकि उसे डर था कि उसका ‘राम’
समाज के ‘राम’ से टकरा जाएगा। यह पत्र साबित करता है कि लेखन छपने के लिए
नहीं,
आत्म-संतोष और ‘स्वान्तः
सुखाय’
के लिए भी होता है। पुस्तक के सबसे मर्मस्पर्शी पत्रों में
से एक है डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ का पत्र। वे अपने
पहले प्रेम और वर्तमान में ‘ब्रेस्ट कैंसर’ से अपनी लड़ाई का जिक्र करती हैं। वे कैंसर को एक ‘अनचाहा मेहमान’ कहती हैं और
पूरे हौसले के साथ उससे लड़ रही हैं। विजय जी अपने उत्तर में उनकी जिजीविषा को नमन
करते हैं और उनके मुंडन वाली तस्वीर को साहस का प्रतीक बताते हैं। यह पत्राचार
पाठकों को जीवन की कठिनाइयों में भी मुस्कुराने का संदेश देता है।
विजय कुमार तिवारी जी इस पुस्तक में एक सूत्रधार और अभिभावक
की भूमिका में नजर आते हैं। वे हर पत्र का उत्तर पूरे धैर्य, सम्मान और आत्मीयता से देते हैं। जहाँ युवा लेखक हताश हैं, वहाँ वे उन्हें प्रोत्साहन देते हैं। जहाँ वरिष्ठ लेखक
चिंतित हैं,
वहाँ वे उनके साथ खड़े होकर समाधान खोजते हैं। उदाहरण के
लिए,
जब कश्मीरा सिंह,छपरा
से मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण रिश्तों में आई गिरावट और अश्लीलता पर चिंता
जताती हैं,
तो तिवारी जी उन्हें समझाते हैं कि तकनीक का अपना महत्व है, बस हमें मानवीय मूल्यों को बचाए रखना है। संपादक महोदय का
अपना लेखन भी इस पुस्तक में निखर कर आया है। पुस्तक में शामिल उनकी कहानी ‘तुम्हारे प्रेम के नाम’, जो पत्र शैली
में लिखी गई है,
प्रेम की एक उदात्त और सात्विक परिभाषा गढ़ती है। इस कहानी में प्रेमी अपनी प्रेमिका को लिखता है, ‘तुमने कहा था, ‘मैं बहुत
प्रेम करती हूँ,
परन्तु मेरा प्यार वो वाला प्यार नहीं है’।’ यह कहानी प्रेम, विरह और त्याग
का अद्भुत कागजात है।
चूँकि यह पत्रों का संग्रह है, इसलिए इसकी भाषा अत्यंत सहज, सरल और अनौपचारिक है। इसमें क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग नहीं है, बल्कि वह हिंदी है जो दिलों को जोड़ती है, ‘हिंदुस्तानी’। पत्रों में
कहीं भोजपुरी का पुट है,
तो कहीं अवधी की मिठास। कहीं अकादमिक गंभीरता है, तो कहीं घरेलू नोक-झोंक। लेखकों ने ‘आदरणीय’, ‘स्नेही’, ‘चाचा जी’, ‘भाई साहब’ जैसे संबोधनों का प्रयोग किया है, जो उस आत्मीयता को पुनर्स्थापित करते हैं जो ‘हेलो’ और ‘हाय’
के शोर में कहीं खो गई थी। विजय जी के उत्तरों की भाषा अत्यंत संयमित और संस्कारित
है। वे असहमति भी बहुत विनम्रता से दर्ज कराते हैं।
‘आपके पत्र मेरे नाम’ समय के गाल पर एक तमाचा है, उस समय के गाल पर जो हमें रोबोट बना रहा है। यह
पुस्तक हमें ठहरना सिखाती है। यह बताती है कि किसी के हस्तलिखित शब्दों को पढ़ने
में जो सुख है,
वह टाइप किए गए फॉन्ट में नहीं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं
होगा कि हिंदी साहित्य में ‘द्विवेदी युग’ और उसके बाद पत्रों के कई संग्रह आए, जैसे ‘कवियों के पत्र’, ‘बनारसीदास चतुर्वेदी के पत्र’, लेकिन पिछले कुछ
दशकों में यह परंपरा थम सी गई थी। विजय कुमार तिवारी ने इस पुस्तक के माध्यम से उस
सूखे हुए स्रोत को फिर से खोल दिया है। यह पुस्तक वर्ष 2024-25 के साहित्यिक और सामाजिक मनःस्थिति का एक ऐतिहासिक प्रमाण
है। आज से 50
साल बाद, जब कोई शोधार्थी 21वीं सदी के तीसरे दशक के लेखकों के द्वंद्व को समझना चाहेगा, तो यह पुस्तक एक संदर्भ ग्रंथ का काम करेगी।
बहरहाल, यह पुस्तक प्रमाणित करती है कि साहित्य एकाकी साधना
नहीं है। यह एक सामूहिक यज्ञ है। इसमें एक बड़े लेखक रामदेव धुरंधर और एक नई
लेखिका सौम्या पाण्डेय को एक ही मंच पर, एक ही सम्मान
के साथ जगह दी गई है। जहाँ सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और नकारात्मकता का बोलबाला है, यह पुस्तक संवाद, सम्मान और
प्रेम का पक्ष रखती है। यह ‘ध्वंस’ नहीं, ‘सृजन’ की बात करती है। यद्यपि यह प्रयास स्तुत्य है, फिर भी एक समीक्षक के नाते कुछ बातें खटक सकती हैं। कुछ
पत्र बहुत अधिक व्यक्तिगत हैं, जिनमें साहित्य कम और
निजी प्रशंसा अधिक है। संपादक चाहते तो उन्हें थोड़ा संपादित कर सकते थे। इसके
अलावा,
कुछ पत्रों में एक ही बात की पुनरावृत्ति जैसे सोशल मीडिया
की बुराई होती है, जिससे एकरसता आ सकती है। लेकिन, पत्रों की मौलिकता बनाए रखने के लिए शायद संपादक ने उन्हें
छेड़ना उचित नहीं समझा।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा
कि
‘आपके पत्र मेरे नाम’ एक मशाल है जो अंधेरे में रास्ता दिखा रही है। यह पुस्तक हमें स्मरण कराती है
कि हम इंसान हैं और हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी संवेदनाएं हैं, न कि हमारे गैजेट्स। संपादक महोदय ने ईंट-पत्थर के मकानों
के बीच ‘शब्दों का घर’ बनाया है। जिस
तरह पुस्तक की भूमिका में लेखक ने लिखा है, ‘ये केवल पत्र नहीं हैं, आज की पीढ़ी के सक्रिय साहित्यकारों के हृदय की धड़कन है’ यह शत-प्रतिशत सत्य है। यह पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है।
इसे पढ़ते समय आपको बार-बार लगेगा कि आप किसी की निजी डायरी पढ़ रहे हैं, या किसी के ड्राइंग रूम में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ
बातें कर रहे हैं। यदि आप भूल गए हैं कि
कलम से कागज पर उतरना कैसा लगता है, यदि आप भूल गए
हैं कि डाकिए की साइकिल की घंटी में कितना संगीत होता था, और यदि आप जानना चाहते हैं कि आज का लेखक किन परिस्थितियों
में जी और लिख रहा है,
तो यह पुस्तक आपके लिए ही है। यह पुस्तक तकनीक के शोर के
विरुद्ध ‘मन की शांति’ का घोषणापत्र
है।
पुस्तक: आपके पत्र मेरे नाम (खण्ड-1)
संपादक: विजय कुमार तिवारी
प्रकाशन: हंस प्रकाशन,
नई दिल्ली
वर्ष: 2025
विधा: पत्र साहित्य (पत्राचार संग्रह)
समीक्षक: अजय चौधरी
Comments
Post a Comment