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उच्च शिक्षा का वर्तमान अवलोकन

अजय कुमार चौधरी वर्तमान समय में जब शिक्षा पर विचार-विमर्श करते है तो वर्तमान शिक्षा से पूर्व प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का अवलोकन आवश्यक हो जाता है | प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। शिक्षा के क्षेत्र में भारत 'विश्वगुरु' कहलाता था । वैदिक मनीषियों ने शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तर्ज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है । उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है । प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है । तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके जो कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य था ।शिक्षा हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करती है | शिक्षा का विकास समाज में घटने वाली कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि इसकी एक सुदृढ़ परंपरा रही है | प्राचीनकाल से ही समाज को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए य...

साहित्य और सिनेमा

 साहित्य और सिनेमा अजय कुमार चौधरी                       सिनेमा का इतिहास बहुत पुराना नहीं होते हुए भी इतने कम समय में समाज को जिस तरह प्रभावित किया है वह अकल्पनीय है | सिनेमा हमारे सामाजिक जीवन को इस तरह प्रभावित किया है कि हम उसी के काल्पनिक दुनिया में सैर करते हुए वास्तविक धरातल कि तलाश करते हैं | सिनेमा न केवल समाज को बल्कि समाज के प्रत्येक बिन्दुओं को अपने तरफ आकर्षित किया है , चाहे वह हमारी संस्कृति हो , जीवन शैली हो , साहित्य हो , परंपरा हो , आर्थिक व्यवस्था हो सबको नयी आयाम दी है | सिनेमा के द्वारा ही हम नए समाज की  तलाश में भटक रहे हैं | सिनेमा ने मजह 100 वर्षों में जिस बुलंदियों को छु रहा है साहित्य उसके पीछे दौड़ लगती , थकती सी प्रतीत हो रही है | ऐसा नहीं है कि सिनेमा साहित्य से अलग है , यह भी साहित्य का अभिन्न अंग है लेकिन यह अंग आज जितना अकर्षणीय बन गया है कि शरीर के तरफ बुध्दिजीवियों के अलावा अन्य किसी का ध्यान खींच पाने में असक्षम महसूस कर रहा ...