उच्च शिक्षा का वर्तमान अवलोकन
अजय कुमार चौधरी
वर्तमान समय में जब शिक्षा पर विचार-विमर्श करते है तो वर्तमान शिक्षा से पूर्व प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का अवलोकन आवश्यक हो जाता है | प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। शिक्षा के क्षेत्र में भारत 'विश्वगुरु' कहलाता था । वैदिक मनीषियों ने शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तर्ज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया है । उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है । प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया कि शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है । तथा इस योग्य बनाती है कि वह भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके जो कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य था ।शिक्षा हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करती है | शिक्षा का विकास समाज में घटने वाली कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि इसकी एक सुदृढ़ परंपरा रही है | प्राचीनकाल से ही समाज को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए योग्य प्रार्थी की आवश्यकता होती थी जिसकी पूर्ति शिक्षण संस्थानों द्वारा पूर्ण होती थी हालाकी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था , वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से बिलकुल ही भिन्न थी | प्राचीनकाल में शिक्षा देना एक पवित्र कर्त्तव्य था । आचार्य इसीलिए ‘देवो भव’ – देवतुल्य थे । गुरुदक्षिणा शिक्षा समाप्ति का अनुष्ठान था। याज्ञवल्क्य ने शिक्षा समाप्ति के पूर्व जनक से कोई भी उपहार स्वीकार नहीं किया। शिष्य द्वारा आचार्य को समर्पित ऐसी भेंट स्वैच्छिक होती थी । यह पारिश्रमिक का विकल्प नहीं थी । बृहस्पति स्मृति के अनुसार “विद्यादान पवित्रतम कर्त्तव्य था और भूमिदान से भी श्रेष्ठ था |” गरीबी के आधार पर किसी भी छात्र का प्रवेश न लेना निंदनीय था। आचार्य, विद्यार्थी, अभिभावक, समाज और राजा आदर्श शिक्षा के संचालन को ‘पवित्र कार्य’ मानते थे। समाज सजग और जागरूक था। छात्र भिक्षा मांगते थे । छत्रों को भिक्षा देने से इंकार करना पाप माना जाता था । उत्सवों-पर्वो के अवसर पर योग्य विद्यार्थी और आचार्य समाज द्वारा सम्मानित किए जाते थे। तक्षशिला में ऐसे सम्मान कार्यक्रम अक्सर होते थे । इसके ऐतिहासिक प्रमाण हैं । जातकों में ऐसी अनेक कथाएँ हैं । फाह्यान और ह्वेंसांग की यात्र विवरण ऐसी जानकारियाँ उपलब्ध हैं | उसके यात्रा विवरणों में समाज द्वारा शिक्षा तंत्र को आर्थिक सहायता देने के उल्लेख हैं । ‘पृथ्वीराज विजय’ (10वीं सदी) में अजमेर के आसपास अनेक शिक्षा संस्थाओं के उल्लेख हैं। ‘कथासरितसागर’ के अनुसार “विश्वविद्यालय को धनिक नागरिकों द्वारा आर्थिक सहयोग दिये जाते थे । संपन्न लोग शिक्षा संस्था भी बनाते थे। अपने परिजनों की स्मृति में शिक्षण संस्थाएँ चलाने की परंपरा बहुत प्रतिष्ठित थी। वेद, उपनिषद् और ऐसा ही ढेर सारा वैज्ञानिक, सामाजिक साहित्य पढ़ाने में जनसामान्य की रूचि थी | प्राचीन कल में शिक्षा का मूल उद्देश्य धर्म,अर्थ,कम मोक्ष की प्राप्ति थी |”
धर्म का तात्पर्य यहाँ स्वयं को जागृत , ज्ञान की प्राप्ति और राष्ट्र का अभ्युदय था । यहाँ धर्म का अर्थ पुजा –पाठ ,कर्मकांड से नहीं बल्कि आत्मभ्युदय से था | शिक्षा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का साधन थी। भारत का धर्म अंध आस्था नहीं थी । इसका विकास वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही हुआ था । धर्म की शिक्षा का तात्पर्य यहाँ कर्मकाण्ड , पूजापाठ की विधि रटाना नहीं था । संभवत:गांधी जी ने ऐसी ही शिक्षा का समर्थन किए थे | कुछेक विद्वान इसे अंध आस्थावादी बताते हैं लेकिन गाँधीजी ने स्वयँ धर्म की शिक्षा को नीति की शिक्षा बताया है। सबसे पहले तो धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जानी चाहिए। (हिन्द स्वराज पृष्ठ-92) यहाँ धर्म का मतलब नीति है । समाज को ठीक दिशा में ले जाने वाली आचार सारिणी का नाम ‘नीति’ है, इसी की परम्परा का नाम रीति है। भारत में धर्म का मतलब अंधआस्था नहीं है । यहाँ धर्म का अर्थ व्यक्ति या वस्तु का स्वभाव है । प्राणी या वस्तुए स्वतंत्र सत्ता नहीं हैं । भारत का धर्म इसी व्यापकता की धारणा है और शिक्षा नीति इसी की सहचरी है।
मध्यकाल तक आते –आते शिक्षा का स्वरूप में काफी बदलाव आया | इस समय लगातार विदेशी आक्रमणों से भारत आक्रांत था | शक ,हूण मंगोल,अफगान , मुग़ल क्रमश: भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किए वैसे-वैसे भारतीय शिक्षा के मुल स्वरूप में भी बदलाव होता चला गया | प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में जहां संस्कृत कि प्रधानता थी अब वहाँ फारसी और उर्दू ने स्थान ले लिया | भाषा के साथ - साथ संस्कृति ,लोक व्यवहार, वेश-भूषा में भी अमूलचुल परिवर्तन आया | भारत में जैसे ही ब्रिटिश शासन का आधिपत्य स्थापित हुआ वैसे ही हमारी शिक्षा व्यवस्था की नींव ही हिल गई | ब्रिटिश शासन को भारत में अपने काम- काज के लिए विदेशों से लाए कर्मचारियों का लागत ज्यादा होने कारण इन्हें असुविधाएँ होती थी | ब्रिटेन की संसद ने इस समस्या पर विचार- विमर्श के लिए ब्रिटेन के प्रकांड विद्वान मैकाले को भारत में भेजा | मैकाले भारत के कोने –कोने में भ्रमण किया,अपने अनुभव और विचारों को जगह-जगह रेखांकित करते हुए ,२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में भारत के प्रति विचार और योजनाएँ पेश करते हुए कहा-" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..... मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया , जो भिखारी हो ,जो चोर हो , इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है , इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं , की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे, जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है |…..और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था , उसकी संस्कृति को बदल डालें , क्योंकि अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी विदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है, और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है , तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं |….. एक पूर्णरूप से गुलाम भारत ,रक्त भले ही भारतीय हों लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों |" ब्रिटिश काल में शिक्षा में मिशनरियों का प्रवेश हुआ , इस काल में महत्वपूर्ण शिक्षा दस्तावेज में मैकाले का घोषणा पत्र 1835, वुड का घोषणा पत्र 1854, हण्टर आयोग 1882 सम्मिलित हैं। इस काल में शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजों के राज्य के शासन सम्बन्धी हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था |
मैकाले का उद्देश्य शिक्षा प्रचार-प्रसार नहीं था बल्कि अपने प्रसाशनिक कामकाज के लिए अँग्रेजी के सस्ते मुलाजिम तैयार करना था | मैकाले के शब्दों में "हमें एक हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हम अंग्रेज शासकों एवं उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके , जिन पर हम शासन करते हैं। हमें हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है |” इस तरह भारतीय शिक्षा में अँग्रेजी शिक्षा की घुसपैठ हुई | इस शिक्षा का इतना गंभीर प्रभाव पड़ा की आज तक मैकाले की संतान इसका गुणगान करते हैं | खैर मेरा उद्देश्य वर्तमान उच्च शिक्षा पर परिचर्चा करना है इसलिए अँग्रेजी भाषा पर फिर कभी और चर्चा करेंगे | भारत के तत्कालीन मनीषियों डॉ0 राधाकृष्णन ,स्वामी विवेकानंद ,महारमा गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त किए है गांधी जी बुनियादी शिक्षा को महत्व देते है | गांधीजी ने सबसे पहले बुनियादी शिक्षा की कल्पना की थी । आज जिसे विश्वविद्यालय स्तर पर "फाउंडेशन कोर्स" कहा जाता है , उसकी पृष्ठभूमि में गांधी की बुनियादी यानी बेसिक शिक्षा ही तो थी। इस बुनियादी प्रशिक्षण और प्राथमिक स्तर की शिक्षा के दो स्तर थे- स्कूली बच्चे कक्षा-एक से ही तकली से सूत कातते थे; रूई से पौनी बनाते थे और सूत की गुड़िया बनाकर या तो खादी भंडारों को देते थे या बैठने के आसन, रुमाल, चादर आदि बनाते थे । शिक्षा के बारे में गांधीजी का दृष्टिकोण वस्तुत: व्यावसायपरक था । उनका मत था कि भारत जैसे गरीब देश में शिक्षार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ कुछ धनोपार्जन भी कर लेना चाहिए , जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें । इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने ‘वर्धा शिक्षा योजना’ बनायी थी। शिक्षा को लाभदायक एवं अल्पव्ययी करने की दृष्टि से सन् १९३६ ई. में उन्होंने ‘भारतीय तालीम संघ’ की स्थापना की। काका साहेब कालेलकर के शिक्षा को विशेष महत्व देते है - “मैं सत्ता की दासी नही हूँ , कानून की किकंरी नहीं हूँ। विज्ञान की सखी नही हूँ, कला की प्रतिहारी नही हूँ , अर्थशास्त्र की बादी नहीं हूँ , मैं तो धर्म का पुनरागमन हूँ , मनुष्य की बुद्वि , रहस्य एवं इन्द्रियों की स्वामिनी हूँ। मानसशास्त्र एवं समाजशास्त्र मेरे दो चरण है । कला और कारीगरी मेरे दो हाथ है। विज्ञान मेरा मस्तिष्क है । धर्म मेरा हृदय है । निरीक्षण और तर्क मेरी आंखे है । इतिहास मेरे कान है । स्वतंत्रता मेरा श्वास है । उत्साह और उधोग मेरे फेफड़े है, धैर्य मेरा वृत है। श्रध्दा मेरा चैतन्य है । ऐसी में जगदम्बा हूँ । मेरा उपासक कभी किसी का मोहताज नहीं रहेगा । उसकी सभी कामनाएँ मेरी कृपा से तृप्त हो जाएगी। हमे शिक्षा का यही स्वरूप स्थापित करना है |” युनेस्को की डेलर्स कमेटी के रिपोर्ट में कहा है कि “किसी भी देश की शिक्षा उस देश की संस्कृति एवं प्रगति के लिए होनी चाहिए|” आजादी के लगभग दो वर्षों के बाद भारत 26 जनवरी,1950 को गणतन्त्र घोषित किया गया | गणतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार उच्च शिक्षा के प्रचार-प्रसार के 1952 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया गया | जिसका उद्देश्य विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों आदि शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता को बनाए रखे | उच्च शिक्षा के गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए समय समय पर शिक्षा कमीशन भी बनाए गए | सन् १९६४ में भारत की केन्द्रीय सरकार ने डॉ दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में स्कूली शिक्षा प्रणाली को नया आकार व नयी दिशा देने के उद्देश्य से एक आयोग का गठन किया । इसे ‘कोठारी आयोग’ के नाम से जाना जाता है। डॉ0 कोठारी उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे । आयोग ने भारतीय स्कूली शिक्षा की गहन समीक्षा प्रस्तुत की जो भारत के शिक्षा के इतिहास में आज भी सर्वाधिक गहन अध्ययन माना जाता है । कोठारी आयोग (1964-66) या राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, भारत का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने अपनी रिपार्ट में सामाजिक बदलावों को ध्यान में रखते हुए कुछ ठोस सुझाव दिए । आयोग ने बालिकाओं को विज्ञान व गणित की शिक्षा दी जाने की सलाह दी । 25 प्रतिशत माध्यमिक स्कूलों को ‘व्यावसायिक स्कूल’ में परिवर्तित कर दिया गया । सभी बच्चों को प्राइमरी कक्षाओं में मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाय। माध्यमिक स्तर (सेकेण्डरी लेवेल) पर स्थानीय भाषाओं में शिक्षण को प्रोत्साहन दिया जाए । 24 जुलाई 1968 को भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई । यह पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर आधारित थी । सामाजिक दक्षता, राष्ट्रीय एकता एवं समाजवादी समाज की स्थापना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया । इसमें शिक्षा प्रणाली का रूपान्तरण कर 10+2+3 पद्धति का विकास, हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में विकास , शिक्षा के अवसरों की समानता का प्रयास , विज्ञान व तकनीकी शिक्षा पर बल तथा नैतिक व सामाजिक मूल्यों के विकास पर जोर दिया गया । साथ ही छात्रों के चरित्र निर्माण एवं राष्ट्रभक्ति तथा समाज सेवा का भाव जगाने हेतु प्रत्येक पाठयपुस्तकों में मूल्यों का समावेश किया गया । इस हेतु सभी स्तर पर सामाजिक कार्य को अनिवार्य किया जाना चाहिए । शारीरिक शिक्षा सभी स्तर पर अनिवार्य रूप से हो । खेल का प्रशिक्षण भी उसमें जोड़ना चाहिए । शिक्षा मात्र सैध्दान्तिक न होते हुए व्यावहारिकता से जोडनी होगी | शिक्षा श्रमप्रधान, कर्मप्रधान, कौशल्य निर्माण तथा रोजगार सृजन (नौकरी परक नहीं) हो। शिक्षा का प्राचीन एवं आधुनिकता तथा आध्यात्मिकता एवं भौतिकता का समन्वित स्वरूप बने । शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो । सारी पाठयपुस्तकें भारतीय भाषाओं में तैयार हों । शिक्षा सरकार के शिकंजे एवं राजनीति के पंजों से मुक्त हो। इस हेतु राष्ट्रीय स्तर पर ‘स्वायत्ता शिक्षा संस्था. का गठन किया जाय। उसकी रचना राज्य, जिला स्तर तक की जाये।
आचार्य विनोवा भावे का मानना है कि “शैक्षणिक व्यवस्था सरकार के नियंत्रण से पूर्णरूप से मुक्त होनी चाहिए । शिक्षार्थी को किसी भी बाह्य हस्तक्षेप से मुक्त, उन्मुक्त वातावरण में विद्याध्ययन की व्यवस्था हो । विद्या केन्द्रों की व्यवस्था पर समाज का नियंत्रण हो , सरकार का नहीं |” डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना है कि “शिक्षा का उद्देश्य मात्र बौद्धिक स्वाधीनता नहीं है, इसका उद्देश्य हृदय और अन्तश्चेतना की मुक्ति है। बाहर दिखाई देने वाली मलिन बस्तियों की अपेक्षा मानसिक मलिन बस्तियां कहीं अधिक खतरनाक है । बाह्य पर्यावरण में परिवर्तन लाने का क्या लाभ यदि हम मन में परिवर्तन नहीं ला पाते ? हमें स्वयं में परिवर्तन लाना होगा , और यदि हम चाहते है कि हममें परिवर्तन हो, तो यह प्रक्रिया हमें उन संस्थाओं में प्रारम्भ करनी होगी जो विद्यार्थियों की आवश्यकता की पूर्ति करती है |” प्राचीन भारत में जिस शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया गया था वह समकालीन विश्व की शिक्षा व्यवस्था से समुन्नत व उत्कृष्ट थी लेकिन कालान्तर में भारतीय शिक्षा का व्यवस्था का ह्रास हुआ । विदेशियों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को उस अनुपात में विकसित नहीं किया, जिस अनुपात में होना चाहिये था । अपने संक्रमण काल में भारतीय शिक्षा को कई चुनौतियों व समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज भी ये चुनौतियाँ व समस्याएँ हमारे सामने हैं जिनसे दो-दो हाथ करना है। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही भारतीय शिक्षा को लेकर अनेक जद्दोजहद चलती रही। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार के लिए अनेक प्रयास किए । यह और बात है कि इन प्रयासों की अनेक खामियाँ भी सामने आई हैं जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
आधुनिक उच्च शिक्षा मशीनी शिक्षा का पर्याय बन गया है विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर समाजिक जिम्मेदार इंसान नहीं ,बल्कि रुपये कमाने की मशीन बनना चाहता है, शिक्षा के इस दौर में अभिभावक भी अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देना चाहता है जिससे वो भविष्य में सुख-सुविधा से सम्पन्न हो, आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो | शिक्षा का पर्याय ही प्रतिस्पर्धा हो गई है | ऐसी उच्च शिक्षा के चकाचौंध में मानवीयता कहीं खोती जा रही है नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है || विद्यार्थियों का आचरण और व्यवहार गौण होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव हम समाज में देख सकते है कि किस प्रकार उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात विद्यार्थी मोटे-मोटे पैकेज के लिए अपने अभिभावकों को उनके हालत पर छोड़कर विदेश चले जाते है और वहाँ से अपने अभिभावके के लिए केवल आर्थिक सहायता भेजते है | ऐसे हालात में अभाभवकों को वृध्दाश्रम में जीवन जीने को मजबूए हो रहे हैं | किसी भी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र का योग्य प्रकार से विकास तभी संभव है जब उसका अस्तित्व स्वतंत्र हो । स्वतंत्रता का अर्थ है अनावश्यक वस्तुओं की निर्भरता से मुक्ति पाना। वर्तमान में देश में शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पुन: स्थापित करना है तो शिक्षा, शासन, प्रशासन, राजनीति एवं बाजार के प्रभाव से पूर्णरूप से मुक्त होनी चाहिए । भारतीय शिक्षा बालेने पर शिक्षा भारतीय नहीं होगी। हमारे यहां शिक्षा के मूलभूत सिद्वांत तो शावत सत्य है। लेकिन आधुनिक आवश्यकता के अनुसार एक नई व्यवस्था देनी होगी । एक प्रकार से प्राचीन एवं आधुनिकता का समन्वय करना होगा। प्रत्येक विषय के सन्दर्भ में इस प्रकार कार्य करने से जो स्वरूप बनेगा। भारतीय शिक्षा के इस आधुनिक स्वरूप को दुनिया स्वीकार करें |
अजय कुमार चौधरी
सहायक प्राध्यापक , हिन्दी
पी0 एन0 दास कॉलेज ,
शांतिनगर ,पलता, बंगाल इनामेल ,उत्तर 24 परगना
पश्चिम बंगाल-743165
संपर्क-08981031969
Email- ajaychoudharyac@gmail.com
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