सरप्राइज और लड़की (कहानी-संग्रह) : कृष्ण कुमार भगत
लेखक: कृष्ण कुमार भगत
प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली
वर्ष: 2025
समीक्षक: अजय चौधरी
मूल्य: 250/-
यथार्थ की ज़मीन पर रिश्तों और व्यवस्था का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
अजय चौधरी
8981031969
साहित्य की सभी विधाओं में 'कहानी' मानव जीवन और समाज के नब्ज पकड़ने के साथ संवेदनाओं के सबसे निकटतम होने के कारण सर्वोपरि विधा के रूप में स्वीकार किया गया है। कहानी अब मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा है, यह समाज के मौजूदा हालात की एक यथार्थ तस्वीर’ बयां करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इस विधा की असली शक्ति उसकी संवेदना और यथार्थवाद में निहित है। यह पात्रों के सुख-दुख और उनके मानसिक अंतर्द्वंद्व से इस कदर जोड़ देती है कि वह स्वयं को कथा का हिस्सा महसूस करने लगता है। देखा जाता है कि सामाजिक चेतना जागृत करने में कहानी एक अमोघ अस्त्र की तरह काम कर रही है। वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियों पर, प्रशासनिक संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के लिए कहानी एक कारगर हथियार का कार्य करती है।
कृष्ण कुमार की कहानियों को पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो
संवेदनाओं की छोटी-छोटी अनुभूतियों को सहेजने के लिए लेखक ने जिन शब्दों का प्रयोग
किया है, वे अनुभव की भट्टी में तपकर गाढ़े हो गए
हों। उनकी सारी कहानियाँ ऐसी भावनाओं के साथ गुँथी हुई हैं कि उन्हें सहजता से
बीनकर छाँटना मुश्किल हो जाता है। उनके कहानी संग्रह 'सरप्राइज
और लड़की' में ऐसी ही कई कहानियों का संकलन है, जो अलग-अलग पृष्ठभूमियों पर लिखी गई हैं। सहज कथानक के साथ लेखक संवेदनाओं
की अनुभूतियों में ऐसे गोते लगाते हैं कि हाथ में मोतियों सी चमत्कृत करने वाले
उत्कर्ष का आगमन होता है। इनकी सारी कहानियाँ—चाहे 'दिल्लगी'
हो, 'पॉकेटमार' हो या 'फेसबुक' या कहानी-संग्रह की शीर्षक वाली कहानी
पढ़नेवाले को एक ऐसे भावनात्मक मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं कि वह कई दिनों तक उस
प्रभाव या सदमे से उबर नहीं पाता है।
किसानी प्रवृति के धनि लेखक की कहानी संग्रह ‘सरप्राइज और
लड़की’ ऐसे समय में एक साहित्यिक सेतु काम कर रही है जो अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के संघर्षों और भविष्य की संभावनाओं को एक सूत्र में
पिरोकर समाज को नई दिशा प्रदान करने की क्षमता रखती है। वे स्वयं को एक सीमांत
किसान
और लेखक के रूप में देखते हैं। वे मुंशी प्रेमचंद का उल्लेख करते हुए इस बात पर बल भी देते
हैं कि यथार्थ को केवल देखने और उसे भोगने में बहुत अंतर होता है। साहित्य जगत में उनका स्थान उन लेखकों में है जो ग्रामीण
जीवन के रिसते हुए घावों को बिना किसी बनावट के प्रस्तुत करते हैं।
लेखक की पहली पहचान उनकी आत्मकथा 'सन ऑफ दा त्रिवेणी दास भगत' से बनी,
जो उनके साहित्य में सामाजिक न्याय और दलित चेतना की नींव
रखती है। साहित्य जगत में वे एक ऐसे कहानीकार के रूप में स्थापित हैं जो ग्रामीण
विसंगतियों
को उजागर करते हैं, जैसे 'परमाण पत्तर'
में गरीब की बेबसी, सत्ता के विद्रूप चेहरे को बेनकाब करते हैं, 'शाबाश मधु' और 'सरप्राइज और लड़की' में भी देखा
जा सकता है। लेखक महिला अस्मिता और उनके
संघर्ष को केंद्रीय स्थान देते हैं। वे केवल ग्रामीण कथाकार के रूप में सामने आते
हैं, उनकी पारखी नजर महानगरीय विद्रूपताओं जैसे 'आखिरी सफर' और 'पॉकेटमार' का भी परख करते हैं। वे आधुनिक तकनीक फेसबुक, नेट और उसके
कारण उपजे मानवीय अकेलेपन को साहित्य का विषय बनाकर समकालीन बोध के साथ भी जुड़ते
हैं।
इस कहानी-संग्रह की स्थिति पर विचार करें, तो पाते हैं कि इनकी कहानी साहित्य की वह विधाके रूप में
उभरते हैं जो अपने संक्षिप्त आकार के बावजूद समाज की विसंगतियों को पूर्णता के साथ
व्यक्त करने की क्षमता रखती है। इनके कहानी के माध्यम से उन लोगों के संघर्ष को
स्वर मिलता है जो मुख्यधारा के विमर्श से गायब रहते हैं। महिलाओं के खिलाफ होने
वाले शोषण और उनके द्वारा किए जाने वाले विद्रोह को कहानीकार संवेदनशीलता से प्रस्तुत
करती है। इनकी कहानी में बाहरी घटनाओं का वर्णन मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को
भी टटोलती है। 'फेसबुक' और 'दिल्लगी' जैसी कहानियाँ आधुनिक युग में मानवीय
रिश्तों के बदलते स्वरूप, संदेह, अकेलेपन
और आभासी सुख की मनोवैज्ञानिकता को परत दर परत उघाड़ती हैं, जो जड़ों से जुड़ी
रहती है। इस संग्रह में 'नीलम्मा' और
'बल' जैसी कहानियाँ विस्थापन, सांस्कृतिक पहचान और जातीय संघर्षों के इतिहास को सहेजकर रखती है। साहित्य
में इस कहानी-संग्रह का स्थान इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि यह 'खुला पत्र' या 'सरप्राइज और
लड़की' की तरह सत्ता, प्रशासन और भ्रष्टाचार
पर सीधा और मारक प्रहार कर सकती है, व्यवस्था के प्रति सवाल पूछने की चेतना भी जागृत
करती है।
इनकी कहानियाँ 'सत्य
के अन्वेषण' और 'मानवता के पक्षधर'
के रूप में सदैव अडिग रहा है, इस कहानी-संग्रह में कुल 16 कहानियाँ संकलित हैं, जो समाज के विभिन्न वर्गों,
संवेदनाओं और विसंगतियों को प्रकाश में लाने का काम करती हैं। इसकी पहली
कहानी ‘दिल्लगी’ विश्वास और पति-पत्नी के संबंधों पर आधारित है। कल्पना का बचपन का
मित्र कमल अचानक उसके घर आ जाता है, जिससे कल्पना डर जाती है
कि कहीं उसका पुराना प्रेम प्रसंग उसके वर्तमान वैवाहिक जीवन में तूफान न ला दे।
अंत में पता चलता है कि कल्पना के पति राजीव और कमल पुराने मित्र हैं, और कमल ने
शादी से पहले ही सब कुछ राजीव को बता दिया था। राजीव केवल कल्पना के साथ 'दिल्लगी' कर रहा था। वहीं ‘तुच्छ’ कहानी का नायक
सुनील अपनी पत्नी की सहेली सीमा को देखकर घृणा से भर जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि सीमा एक 'सेक्स वर्कर'
है। बाद में उसकी पत्नी अनीता उसे सीमा के अतीत की सच्चाई बताती है
कि कैसे वह एक धोखेबाज प्रेमी का शिकार हुई और उसने सुनील के जीवन को बचाने के लिए
खुद को उससे दूर कर लिया था। सुनील को अपनी सोच पर ग्लानि होती है। ‘नीलम्मा’
कहानी की नायिका केरल की रहने वाली एक ए.एन.एम. नर्स की संघर्ष की लंबी गाथा है।
वह रूपेश शर्मा नामक व्यक्ति के प्रेम जाल में फँसती है, जो
उसका शोषण करता है। कई सामाजिक उतार-चढ़ाव और अपमान झेलने के बाद उसकी शादी हेमंत
से होती है। कहानी अंतर-धार्मिक विवाह और अंततः नीलम्मा की मृत्यु के बाद उपजी
विडंबनाओं को दर्शाती है। ‘लाडो जाग उठी’ में महिला सशक्तीकरण और दलित चेतना की
कहानी है। लाडो का पति होशियार सिंह उसे महिला आरक्षित सीट से ग्राम प्रधान
चुनवाता है ताकि वह खुद सत्ता चला सके। लेकिन लाडो धीरे-धीरे अपनी शक्तियों को
पहचानती है और अपने पति के दबाव के विरुद्ध जाकर भूमिहीन दलितों के हक में
स्वतंत्र निर्णय लेने लगती है। ‘परमाण पत्तर’ में करतार नामक एक गरीब बैलगाड़ी
चालक की हृदय गति रुकने से मृत्यु हो जाती है। उसका भाई सरबजीत बीमा और लोन माफी
के लिए डॉक्टर से 'परमाण पत्तर' माँगता
है, लेकिन डॉक्टर कानूनी औपचारिकताओं और अपनी 'मार्केट वैल्यू' का हवाला देकर मना कर देता है। यह
कहानी गरीबों के प्रति तंत्र की संवेदनहीनता को दर्शाती है। ‘बल’ यह कहानी
कुमाऊँनी परिवेश में जातिवाद और विस्थापित लोगों के संघर्ष को दिखाती है। ब्राह्मण
कन्या चम्पा और पाकिस्तान से विस्थापित 'शूद्र' परिवार के प्रणय के बीच प्रेम विवाह होता है। चम्पा के पिता पुरानी
परंपराओं को नहीं तोड़ पाते, लेकिन अंततः वे इस नए रिश्ते को
स्वीकार करते हैं। ‘नेट’ कहानी में अंशुमामा के माध्यम से शहरी समाज के खोखलेपन और
रिश्तों में धोखे को उजागर करती है। मामा को उनके ससुराल वालों ने उनकी कोठी और
संपत्ति से बेदखल कर दिया। अब वे अकेले जीवन बिता रहे हैं और उनका एकमात्र सहारा 'नेट' इंटरनेट और मोबाइल है, जिसके
माध्यम से वे दुनिया से जुड़े हैं। इस संग्रह की चर्चित कहानी ‘फेसबुक’ सेवानिवृत्त
अधिकारी जगत नारायण देव की पत्नी सरला की मृत्यु हो चुकी है और उनके बच्चे अपने
जीवन में व्यस्त हैं। देव साहब नितांत अकेले हैं और 'फेसबुक'
पर मिलने वाली जन्मदिन की बधाइयाँ उन्हें आभासी सुख तो देती हैं,
लेकिन उनका असली अकेलापन दूर नहीं कर पातीं। यह जीवन की ऐसी सच्चाई
है जिससे समाज मुंह नहीं चुरा सकता है। आभासी दुनिया का सुख क्षणभंगुर होता है,
फिर भी युवाएँ इस वास्तविकता को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। ‘आखिरी
सफर’ यह कहानी लेखक एक रेल यात्रा के दौरान हातिम नामक एक जीवंत युवक से मिलता है,
जो सबको अपनी बातों से प्रभावित करता है। कहानी के अंत में लेखक
नोटबंदी के दौर की उन मौतों का उल्लेख करता है, जो लाइनों
में खड़े-खड़े 'आखिरी सफर' पर निकल गए।
‘पॉकेटमार’ इस कहानी में एक शहर के चौक पर प्रधानमंत्री की मूर्ति लगाई जाती है,
जिसमें जेब नहीं बनी होती। एक गरीब बच्चा उस पर प्लास्टिक की जेबें
टाँगता है। बच्चे की मौत हो जाती है। अंत में, पीएम के
जन्मदिन पर जब लेखक मूर्ति को फूल चढ़ाने जाता है, तो उसका
खुद का बटुआ चोरी हो जाता है। ‘शाबाश मधु’ में मधु एक साहसी महिला है जो अपने पति
की नौकरी की गुहार लेकर एक मंत्री के पास जाती है, लेकिन वह
उसका यौन शोषण करता है। मधु इस अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है और मंत्री द्वारा दिए
गए पाँच लाख रुपयों के प्रलोभन को ठुकराकर न्याय के लिए संघर्ष करती है। इस संग्रह
की मूल कहानी ‘सरप्राइज और लड़की’ में गरिमा अमेरिका से अपने पिता ‘जो मुख्यमंत्री
हैं’ को सरप्राइज देने आती है, लेकिन वह अपराधियों का शिकार
हो जाती है। उसे व्यवस्था की सड़ांध का पता चलता है कि उसका पिता भी उसी भ्रष्ट
तंत्र का हिस्सा है। आहत होकर वह अपने पिता की ही लोडेड पिस्टल से आत्महत्या कर
लेती है। ‘जहर-दवा’ में चार बेटे अपनी बीमार बूढ़ी माँ से पीछा छुड़ाने के लिए
डॉक्टर को उसे जहर का इंजेक्शन देने के लिए पैसे देते हैं। लेकिन माँ की जीने की
इच्छाशक्ति दवा के उस जहर से भी तेज निकलती है और वह अंततः जीवित बच जाती है,
जबकि वार्ड बॉय उसे मरा हुआ समझकर इंजेक्शन देने आता है। यह मानवीय
संवेदना को झकझोर देती है। ‘प्रेम-कथा’ यह कहानी प्रणय और चम्पा के जीवन का अगला
भाग है। प्रणय को पुलिसकर्मी सुदीप चंद्र एक झूठे मुकदमे में फँसाकर जेल भिजवा
देता है। चम्पा हार नहीं मानती और कानूनी लड़ाई लड़कर अपने पति की बेगुनाही साबित
करती है। ‘खुला पत्र’ यह कहानी एक लेखक के निजी जीवन और किसानों के संघर्ष को पत्र
शैली में प्रस्तुत करती है। लेखक कर्ज के बोझ और परिवार की माँगों के बीच फँसा हुआ
है। वह साहित्य जगत की विडंबनाओं और किसानों की आत्महत्या जैसे मुद्दों पर गहरा
प्रहार करता है। ‘नया रिश्ता’ में शेखर अपनी पत्नी मानसी और उनके पड़ोसी रवि के
रिश्ते पर संदेह करता है। बाद में अपनी विधवा बहन की पीड़ा को देखकर उसे अपनी गलती
का अहसास होता है। कहानी का अंत शेखर और मानसी द्वारा रवि और शेखर की विधवा बहन
संगीता के बीच एक 'नया रिश्ता' जोड़ने
के संकल्प के साथ होता है।
महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय इस संग्रह में प्रमुख
स्वर के रूप में उभरता है। 'शाबाश मधु' जैसी
कहानियाँ एक आम महिला के अदम्य साहस को दिखाती हैं, जो एक
शक्तिशाली मंत्री के शोषण के खिलाफ खड़ी होती है और प्रलोभनों को ठुकराकर न्याय की
राह चुनती है। वहीं, 'लाडो जाग उठी' ग्रामीण
राजनीति में महिलाओं की बदलती भूमिका का चित्रण है, जहाँ एक
अनपढ़ महिला ग्राम प्रधान के रूप में अपनी शक्तियों को पहचानती है और 'पति-प्रधान' व्यवस्था को चुनौती देते हुए दलितों के
हित में निर्णय लेती है। 'नीलम्मा' की
कहानी अंतर-धार्मिक संबंधों और एक कामकाजी महिला के जीवन भर के संघर्षों एवं उसकी
सामाजिक पहचान की जटिलताओं को मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती है।
सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार पर भी इस संग्रह
की कहानियों ने प्रकाश में लाया है। 'परमाण
पत्तर' कहानी इस तंत्र की क्रूरता का जीवंत उदाहरण है,
जहाँ एक गरीब भाई अपने मृत भाई के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र पाने के
लिए भटकता है, लेकिन डॉक्टर कानूनी और व्यावसायिक कारणों से
उसे मना कर देता है। कहानी का शीर्षक 'सरप्राइज और लड़की'
राजनीति के भयावह चेहरे को उजागर करती है, जहाँ
एक मुख्यमंत्री की अपनी बेटी व्यवस्था की सड़ांध को झेलने के बजाय मौत को गले लगा
लेती है। 'पॉकेटमार' जैसी कहानियाँ
प्रतीकात्मक रूप से देशप्रेम के खोखलेपन और व्यवस्था की उन कमियों को दिखाती हैं,
जहाँ आम आदमी की श्रद्धा का भी शोषण होता है।
आधुनिक जीवन के मनोवैज्ञानिक पहलुओं और बदलते रिश्तों पर संग्रह
की अन्य कहानियाँ केंद्रित हैं। 'नया रिश्ता'
और 'दिल्लगी' जैसी
कहानियाँ वैवाहिक जीवन में संदेह, विश्वास और पुराने संबंधों
के प्रभाव का विश्लेषण करती हैं। 'फेसबुक' और 'नेट' जैसी कहानियाँ
दर्शाती हैं कि कैसे आज के दौर में तकनीक ने संवाद के साधन तो बढ़ा दिए हैं,
लेकिन मनुष्य के भीतर का अकेलापन कम नहीं हुआ है । 'खुला पत्र' के माध्यम से लेखक ने एक
किसान-साहित्यकार के अंतर्द्वंद्व और उसकी आर्थिक चुनौतियों को पत्र शैली में बहुत
ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है, जो आज के समय में लेखकों
की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है।
आज के दौर में जब संदेह और असुरक्षा की भावना वैवाहिक और
पारिवारिक रिश्तों की बुनियाद को हिला रही है, इस
संग्रह की कहानियाँ जैसे 'दिल्लगी' और 'नया रिश्ता' अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं। रिश्तों
में पारिदर्शिता और एक-दूसरे के अतीत के प्रति स्वीकारोक्ति ही भविष्य को सुखद बना
सकती है। विशेष रूप से 'नया रिश्ता' कहानी
विधवा विवाह और पुरुष मानसिकता में बदलाव की वकालत करती है, जो
आज के प्रगतिशील समाज की अनिवार्य आवश्यकता है। जीवन में संदेह का विष घोलने के
बजाय सहानुभूति और समझदारी से रिश्तों को कैसे नया जीवन दिया जा सकता है।
संग्रह की कहानियाँ नारी के विविध रूपों- संघर्षशील, शोषित और सशक्त को चित्रित करती हैं। 'लाडो
जाग उठी' ग्रामीण भारत की उस राजनीतिक सच्चाई को उजागर करती
है जहाँ महिला आरक्षण के बावजूद पुरुष प्रधान समाज महिलाओं को कठपुतली बनाकर रखना
चाहता है। लाडो का विद्रोह आज की हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो अपनी प्रशासनिक
और स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहती है । वहीं 'शाबाश मधु'
कहानी कार्यस्थल पर होने वाले शोषण और राजनीतिक रसूख के खिलाफ एक
साधारण महिला के नैतिक साहस की प्रासंगिकता को सिद्ध करती है। 'नीलम्मा' जैसी कहानियाँ दिखाती हैं कि समाज आज भी
प्रवासी और अकेली कामकाजी महिलाओं के प्रति कितना क्रूर और संकुचित हो सकता है,
जो कार्यस्थल पर सुरक्षा की वर्तमान वैश्विक चिंता से सीधा जुड़ाव
रखती है।
आज के 'डिजिटल युग'
में जहाँ मनुष्य हजारों 'वर्चुअल' मित्रों से घिरा है, लेकिन वास्तविक जीवन में नितांत
अकेला है, इस यथार्थ को 'फेसबुक'
कहानी बहुत ही मार्मिक ढंग से पेश करती है। जगत नारायण देव का
चरित्र उन करोड़ों बुजुर्गों का प्रतिनिधित्व करता है जो तकनीक के माध्यम से दुनिया
से तो जुड़े हैं, लेकिन अपने ही घर में संवाद के लिए तरस रहे
हैं। यह कहानी उस 'डिजिटल डिवाइड' और
भावनात्मक दूरी को रेखांकित करती है जो आधुनिक जीवनशैली की सबसे बड़ी देन है। इसके साथ ही 'नेट' में तकनीक और संपत्ति का लालच मिलकर पुराने रिश्तों की ऊष्मा को समाप्त
कर रहा है।
प्रशासनिक और चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता पर प्रहार करती कहानियाँ जैसे 'परमाण पत्तर' और 'सरप्राइज
और लड़की' आज की व्यवस्था के भयावह चेहरे को उजागर करती हैं।
एक गरीब का मृत्यु प्रमाण-पत्र के लिए भटकना या एक राजनेता की अनैतिक राजनीति के
कारण उसकी अपनी ही बेटी का शिकार हो जाना, ये घटनाएँ हमारे
समय की कड़वी सच्चाई हैं। ये कहानियाँ सत्ता के अपराधीकरण और तंत्र की सड़ांध के
विरुद्ध एक साहित्यिक चेतावनी की तरह खड़ी हैं, जो व्यवस्था
के प्रति चेतना और नागरिक जिम्मेदारी का भाव जगाती हैं।
संग्रह की कहानी 'जहर-दवा'
आज के उपभोक्तावादी समाज में संतानों के नैतिक पतन की चरम स्थिति को
दिखाती है, जहाँ माँ-बाप बोझ समझे जाने लगते हैं। लेकिन इसी
अंधकार के बीच लेखक जीवन की अजेय जिजीविषा को भी स्थापित करते हैं। यह कहानियाँ पारिवारिक जड़ों और नैतिक मूल्यों की
ओर वापस लौटने के लिए प्रेरित करती हैं। लेखक ने बहुत ही सूक्ष्मता से यह स्थापित
किया है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों, मानवीय
गरिमा और सत्य के प्रति आग्रह ही समाज को बचाए रख सकता है।
भाषा की सरलता, सहज
और पात्रों के परिवेश के अनुकूल गूँथा गया है। लेखक ने इस संग्रह में खड़ी बोली
हिंदी के साथ-साथ उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी
और स्थानीय बोलियों को मिश्रण किया है, जो कहानियों को
यथार्थवादी धरातल के करीब लाकर खड़ा कर देती है। भाषा में तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का संतुलित प्रयोग मिलता है। जहाँ एक ओर 'प्रस्तर प्रतिमा', 'नतमस्तक' और
'कृतघ्न' जैसे शब्दों का प्रयोग भाषा
को गंभीर बनाता है, वहीं दूसरी ओर 'मजलिस',
'औपचारिकता', 'साभिवादन' और 'हिकारत' जैसे उर्दू शब्दों
का प्रयोग संवादात्मकता को बढ़ाता है। लेखक ने आधुनिक संदर्भों को स्पष्ट करने के
लिए अंग्रेजी शब्दों जैसे 'व्हाट्स एप्प', 'फेसबुक', 'लैपटॉप', 'सैट',
'ई-रिक्शा' और 'लिव-इन
रिलेशनशिप' का भी बेझिझक जगह दिया है, जो
आज की पीढ़ी और शहरी जीवन की वास्तविकता को अंधेरे के गुफा से बहार निकलता है।
कहानियों में वर्णनात्मक और संवादात्मक दोनों शैलियों का प्रयोग हुआ है। लेखक ने
प्रथम पुरुष में कहानियों को कहा है जैसे 'तुच्छ', 'नेट' और 'आखिरी सफर' में, जिससे पाठक सीधे कथाकार से जुड़ाव महसूस करता
है। भाषा में कहीं-कहीं काव्यता भी दिखाई देती है, विशेषकर
प्रकृति चित्रण या भावनात्मक दृश्यों में, जैसे 'फेसबुक' कहानी में डूबते सूर्य और ओस की बूंदों का
वर्णन। इसके विपरीत, 'खुला पत्र' कहानी
को पत्रात्मक शैली में लिखा गया है, जो पात्र की आंतरिक पीड़ा
और संवेदना को व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस संग्रह की भाषा आम आदमी
की भाषा है जो सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करने के लिए कहीं तल्ख और कहीं
अत्यंत संवेदनशील हो जाती है।
इस कहानी-संग्रह का शीर्षक 'सरप्राइज और लड़की' अर्थपूर्ण और सोद्देश्य है। यह
शीर्षक संग्रह की १२वीं कहानी से लिया गया है। लेखक ने स्वयं 'दो शब्द' में उल्लेख किया है कि आकार में छोटी होने
के बावजूद यह शीर्षक रचना समाज के मौजूदा हालात की एक मुकम्मल तस्वीर बयां करती
है। कहानी में 'सरप्राइज' शब्द का
प्रयोग गरिमा द्वारा अपने परिवार को अचानक मिलने की योजना के रूप में शुरू होता है,
लेकिन व्यवस्था की सड़ांध और पिता के असली चेहरे को जानकर यह 'सरप्राइज' एक भयानक त्रासदी में बदल जाता है। इस
शीर्षक में एक गहरा व्यंग्य भी छिपा है। सामान्यतः 'सरप्राइज'
शब्द खुशी का अहसास कराता है, लेकिन इस संग्रह
में यह शब्द शोषण, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के खुलासे के साथ
आता है। 'लड़की' यहाँ समाज की उस इकाई
का प्रतिनिधित्व करती है जिस पर इस व्यवस्था का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। निष्कर्षतः'सरप्राइज और लड़की' संग्रह अपनी विषयवस्तु और
संवेदनाओं के कारण वर्तमान समय का दर्पण बन गया है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए
एक मार्गदर्शक कृति भी है जो समाज को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाने का प्रयास
करती है।
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