मिस रमिया (उपन्यास) : कावेरी, समीक्षक: अजय चौधरी
पुस्तक: मिस रमिया (उपन्यास)
लेखक: कावेरी
प्रकाशन: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली
वर्ष: 2022
समीक्षक: अजय चौधरी
मूल्य: 395/-
आधुनिक दलित साहित्य में स्त्री विमर्श के नए आयाम’
(कावेरी जी कृत उपन्यास ‘मिस रमिया’ के संदर्भ में)
अजय चौधरी
Mob: 8981031969
हिंदी दलित साहित्य के प्रारंभिक दौर में पुरुष रचनाकारों जैसे ओमप्रकाश
वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, तुलसी
राम आदि का वर्चस्व था। परिस्थितियाँ बदली, समय के साथ महिला साहित्यकारों ने भी
अपनी पीड़ा और शोषण गाथा को हथियार बनाकर इस क्षेत्र में अपने होने का एहसास और
उपस्थिति दर्ज कराई। उन्हीं नामों में से एक कावेरी जी का भी हैं, जिन्होंने ने
'मिस रमिया' जैसे उपन्यासों के माध्यम से इस
विमर्श में स्त्री के स्वर को मजबूती प्रदान की। इनका स्थान उन गिने-चुने दलित
महिला उपन्यासकारों में है, जिन्होंने दलित स्त्री, जातिगत भेदभाव का शिकार के साथ पुरुषवादी मानसिकता, पितृसत्ता के विरुद्ध
भी उतनी ही प्रखरता से संघर्ष करती है। इनका महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने
डॉ. अम्बेडकर के दर्शन और नारों को पात्रों के जीवन दर्शन में पिरोया है। दलित
उपन्यासकारों की कतार में वे एक ऐसी लेखिका के रूप में सामने आती हैं, जो शिक्षा को ‘क्रांति और जीवन का मूल आधार मानती है। उनकी नायिका रमिया
अम्बेडकर के ‘शिक्षित बनो’ के संकल्प को जीती है, जो दलित
साहित्य के ‘प्रतिरोध के सौंदर्यशास्त्र’ एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
आलोचक दलित साहित्य की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वे सिर्फ कड़वाहट और दुख
को रचना का आधार बनाते हैं; यहाँ कावेरी जी इन सबसे अलग नज़र आता है। वे अपनी
रचनाओं में 'मानवीय करुणा' और 'नैतिक श्रेष्ठता' को
सर्वोपरि रखती हैं। जब उनकी नायिका रमिया अपने अपराधी को क्षमा करती है, तो वह दलित साहित्य को नई दिशा के रूप में ‘बदले की भावना’ से निकालकर ‘बौद्धिक
और नैतिक विजय’ की ओर ले जाती हैं। लेखिका की यह दृष्टिकोण उन्हें समकालीन दलित
उपन्यासकारों में एक नई ऊंचाई और अलग दृष्टि प्रदान करता है।
कावेरी जी ने इस उपन्यास के माध्यम से हिंदी साहित्य जगत को एक नई भौगोलिक
पहचान दी है। बिहार के मगही-भोजपुरी परिवेश, पुनपुन नदी के किनारे का जीवन और वहाँ के अकाल का जैसा सूक्ष्म चित्रण वे
करती हैं, उनका यह सूक्ष्म वर्णन उन्हें फणीश्वरनाथ रेणु
जैसे आंचलिक कथाकारों की श्रेणी में खड़ा कर देता है, लेकिन
एक स्पष्ट दलित दृष्टिकोण के साथ। मेरे अनुसार दलित उपन्यासकारों के बीच उनका यह ‘आंचलिक
यथार्थवाद’ अत्यंत दुर्लभ और सराहनीय है। ऐसे अंचलिकता का पूट हम उमराव सिंह
‘जाटव’ के उपन्यास ‘थमेगा नहीं’ में भी देख सकते हैं।
इनका एक पक्ष और सराहनीय है, जहाँ कुछ दलित उपन्यासकार गैर-दलित समाज के प्रति
पूरी तरह से नकारात्मक रुख अपनाते हैं, वहीं कावेरी जी 'मिस रमिया' में
श्यामली जैसे सवर्ण पात्र के माध्यम से सामाजिक समरसता और मित्रता का एक पुल
निर्मित करती हैं। उनका मानना है कि जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई में समाज के
संवेदनशील वर्गों को साथ लेकर चलना अनिवार्य है। उनका यह संतुलन उन्हें एक परिपक्व
और दूरदर्शी रचनाकार बनाता है। दलित उपन्यासकारों के बीच कावेरी जी का स्थान एक
ऐसी ‘वैचारिक सेतु’ के रूप में है, जो अतीत की पीड़ा को
भविष्य की आशा और शिक्षा से जोड़ती हैं। वे एक ऐसी मानवता वादी रचनाकार के रूप में
उभरती है, जिन्होंने अपनी कलम से समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी स्त्री को
स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जीना सिखाया है। जिसने 'अस्मिता
की खोज' को 'सशक्तिकरण के यथार्थ'
में बदला।
यह उपन्यास बिहार के एक यथार्थवादी और आंचलिक परिवेश में बुनी गई है, जो मुख्य रूप से पुनपुन नदी के किनारे बसे
गाँवों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस भौगोलिक परिवेश में पुनपुन नदी का प्रभाव इतना है कि इसे क्षेत्र को 'कोसी' कहा गया है, जो अपनी बाढ़ से किसानों की संचित संपत्ति को नष्ट कर देती
है। यहाँ की सामाजिक संरचना जातिगत
आधार पर टोलों में विभाजित है, जहाँ 'कायस्थ टोला' और 'दलित टोली' के बीच की
दूरियां समाज की संकीर्णता को दर्शाती हैं। इस ग्रामीण अंचल में छुआछूत और भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि स्कूल के
कुएं पर बाल्टी छूने मात्र से एक दलित बालिका को बेरहमी से पीटा जाता है, जैसे वह
इंसान न होकर कोई गंदगी से सना जानवर हो। यह क्षेत्र सामाजिक और आर्थिक रूप से भी जर्जर है, जिसका चित्रण लेखिका ने सन् 1967 के भीषण अकाल और उसके कारण उपजी भूख और मौत के संदर्भ में किया है।
इस संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि के बीच रमिया और श्यामली की अटूट मित्रता की कहानी
एक मानवीय आधार बनती है। उपन्यास की नायिका रमिया, जो एक दलित परिवार से है, अपनी गरीबी और
समाज की अमानवीय परंपराओं के विरुद्ध शिक्षा को अपना पहला अस्त्र बनाती है। आर्थिक
अभाव का आलम यह है कि उसे स्कूल की मामूली फीस के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, वहीं दुख का आलम यह है कि उसके साथ में पढ़ने वाला बैजू को
अपनी परीक्षा फीस के लिए घर की इकलौती गाय बेचनी पड़ती है। लेखिका ने इस मर्मस्पर्शी संघर्ष के साथ-साथ विविध ग्रामीण
संस्कृति के जीवंत रंगों से उकेरा है, जिसमें करमा, तीज और लक्ष्मी पूजा जैसे त्यौहारों के साथ झूमर, लोकगीत और नौटंकी पार्टी के माध्यम से ग्रामीण जीवन की
धड़कन को झींगुर के आवाज तरह महसूस किया जा सकता है।
रमिया की जीवन गाँव की पगडंडियों से शुरू होकर जहानाबाद, गया और पटना जैसे शहरों के शिक्षण संस्थानों तक पहुँचती है। इस पूरे प्रकरण में एक अमानवीय घटना का प्रमाण यह है कि प्रशिक्षण
के दौरान हॉस्टल में भी उसे अपनी जाति के कारण तिरस्कार और अपमान का गलीज व कड़वा
घूंट को भी पीना पड़ता है, जहाँ 'सवर्ण' छात्राएं और
शिक्षिकाएं उसे पंक्ति से अलग बैठने को मजबूर करती हैं, जैसे वह इस ग्रह का प्राणी
ही न हों। यहाँ रमिया इस
अपमान को सहते हुए दिनकर की 'रश्मिरथी' के कर्ण जैसी पीड़ा का अनुभव करती है, लेकिन वह टूटती नहीं है, बल्कि गरम सलाखों की भाँति तपती
हुई फौलाद बन जातीं है। रमिया की यह वैचारिक दृढ़ता डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और बिरसा मुंडा के दर्शन उसे नायकत्व के और करीब ला देता है, जो उसे एक स्वाभिमानी और स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में
विकसित करती है।
उपन्यास का उत्तरार्ध रमिया के पेशेवर जीवन और उसके स्वाभिमान की रक्षा पर
केंद्रित है। बोकारो के एक
हाई स्कूल में शिक्षिका के रूप में वह अपनी कार्यकुशलता से सबका दिल जीत लेती है, लेकिन वहाँ भी उसे एक पुरुष सहकर्मी के जातिगत अहंकार और
दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। भारतीयता और स्त्री को शक्ति को सशक्त करने
वाले गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर सरेआम एक जातिवादी, अहंकारी द्वारा अपमानित
होने के बाद रमिया डटकर उसका मुकाबला करती है और राष्ट्रीय महिला आयोग व
मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं तक उसे घसीट कर ले जाती है। अंत में, जब दोषी शिक्षक दंड के डर से भिक्षा के रूप में माफी मांगता
है,
तो रमिया उसे अंबेडकरवादी मानवतावाद के आधार पर क्षमा कर
देती है। लेखिका का यह उपन्यास
इस संदेश के साथ समाप्त होता है कि शिक्षा जैसे हथियार और नारी चेतना की ‘स्व’ ही
समाज में व्याप्त जातिवाद और पितृसत्ता की सड़ी-गली व्यवस्था को श्मशान की ओर
धकेलने में सक्षम है।
एक सशक्त कथानक के विकास में नायक की भूमिका ही सर्वोपरि होता है। ‘रमिया’ इस उपन्यास
की केंद्रीय नायिका है, जिसका चरित्र
अटूट साहस और बौद्धिक प्रखरता से निर्मित है। बचपन में वह एक ‘पतली नाक, बड़ी-बड़ी आँखें, गोल मटोल चेहरा और चुलबुल स्वभाव
वाली’ बालिका थी, जो पढ़ने में ‘तीव्र बुद्धि वाली’ थी। ठीक
वैसे ही जैसे सुशील टाकभौरे के उपन्यास ‘तुम्हें बदल ही होगा’ की नायिका ‘महिमा
भारती’ है। दलित समाज से होने के कारण उसे बचपन में ही दकियानूसी विचारों से लैस टीकाधारी
मास्टर जैसों से अपमान और शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, लेकिन इस अपमान ने उसे तोड़ने के बजाय उन्हें और अधिक सशक्त और सुदृढ़ बनाया, शिक्षा के प्रति और अधिक संकल्पित बना
दिया। वह एक सफल शिक्षिका, पी.जी.टी. बनती है, जो अपने
आत्म-सम्मान के लिए उच्चाधिकारियों और पितृसतात्मक पुरुषवादी मानसिकता से लड़ने
वाली एक ‘खूंखार शेरनी’ के रूप में उभरती है। रमिया डॉ. अंबेडकर के ‘मानववाद’ के
संदेश को जीती है, इसलिए अंत में अपने शत्रु को क्षमा कर नैतिक श्रेष्ठता भी सिद्ध
करती है; जो उपन्यास का फोकस पॉइंट है।
रमिया के बाद श्यामली इस उपन्यास की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण पात्र है, जो रमिया की अभिन्न सहेली और उसके संघर्षों की सच्ची सहचर है।
वह जाति से सवर्ण 'कायस्थ' वर्ग से
होने के बावजूद, जातिगत भेदभाव की कट्टर विरोधी है, उसका
मानना है, ‘मैं मानव हूँ और मानव से प्रेम करती हूँ, किसी जाति या धर्म से नहीं’। वह रमिया की ही तरह शिक्षित और जागरूक है,
जो बचपन से ही उसे हर विपत्ति में संबल प्रदान करती है। श्यामली का
चरित्र समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो विशेषाधिकार प्राप्त होने के
बाद भी शोषित वर्ग के न्याय के लिए कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष में खड़ा रहता है। उसके
सपने और संघर्ष रमिया के साथ मिलकर एक न्यायपूर्ण समाज की नींव रखते हैं।
इस उपन्यास का पुरुष पात्र बैजू नायक और रक्षक पात्र है, वह नैतिकता और कर्मठता का प्रतीक है। बचपन में उसका चेहरा ‘कमल
जैसी आँखें, सुन्दर नाक और काले घुँघराले बाल’ वाला अलौकिक
था। वह एक निर्धन परिवार से है, गरीबी की विडंबना देखिए जिसे
अपनी पढ़ाई को पूरा कारने के लिए अपनी इकलौती 'गोली गाय'
तक बेचनी पड़ी। वह रमिया और श्यामली को डूबने से बचाता है, साथ समाज की अराजक शक्ति के विरुद्ध गुंडों और लफंगों से उनकी रक्षा के
लिए डटकर खड़ा भी रहता है। वही आगे चलकर पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर भी बनता है और जो
अपनी न्यायिक शक्ति का उपयोग व्यवस्था से प्रताड़ित जरूरतमंदों को न्याय दिलाने में
करता है।
उपन्यास सिर्फ नायक को केंद्र में रखकर नहीं लिखा जाता है, नायकत्व को प्रकाश
में लाने के लिए ऐसे पात्र का भी संयोजन किया गया है जो नायक के व्यक्तित्व को जंग
लगे लोहे को घिसकर चमका देता है। ऐसे पात्र समाज की उस सड़ी-गली और अहंकारी
मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो प्रगतिशील मूल्यों को सहन नहीं कर पाती। रतन, शंकर और अनुज जैसे युवक गली-गली घूमकर लड़कियों के पीछे ‘आवारा
कुत्तों जैसा’ भोंकते हैं और बैजू जैसे मेहनती युवाओं को जाति के नाम पर प्रताड़ित
करते हैं। वहीं, ए.के. सिंह, व ए.पी. सिंह शिक्षित होने के
बावजूद जातिगत द्वेष से भरा हुआ है, जो गणतंत्र दिवस जैसे
पावन अवसर पर सरेआम रमिया को ‘हरामजादी’ जैसी गालियाँ देकर अपने सवर्णवादी
मानसिकता का प्रमाण देता है। ऐसे लोगों के चरित्र से साफ झलकता है कि शिक्षा से
मानसिकता में बदलाव संभवतः कुछ हद तक अपवाद हो सकता है।
कुछ ऐसे पात्र है जो शिक्षगत व संस्थागत में घुन की तरह जमें रहते हैं; जो
भीतर-भीतर पूरी व्यवस्था को कमजोर और शिथिल करता रहता है। ऐसे पात्र ही समाज की
सूक्ष्म राजनीति और 'सिस्टम' के भीतर छिपे भेदभाव को उजागर करते हैं। माधो चाचा अपनी चतुराई से स्कूल
को मान्यता तो दिलाते हैं, लेकिन योग्यता के बजाय जाति को
महत्व देते हुए 'मधु' जो ब्राह्मण है’
को प्रधानाध्यापिका बना देते हैं। मधु दी एक अयोग्य और अहंकारी शिक्षिका है, जो
दलित के फूल जैसे कोमल बच्चों को अछूत समझकर उनसे घृणा करती है और कहती है कि ‘ये
लोग पढ़-लिखकर क्या करेंगे’। इनका चरित्र रमिया की राह में आने वाली उन संस्थागत
बाधाओं को प्रकाश में लाता है जो योग्यता के ऊपर जाति को तरजीह देती हैं।
कावेरी जी अपनी रचनाओं में ऐसी भाषा का प्रयोग करती हैं, जो सीधे पाठक से संवाद कर सके। इसके लिए वे सरल और व्यावहारिक
शब्दों का उपयोग करती हैं, जो कथानक से लेकर चरित्र और
उद्देश्य को सीधे पाठक तक पहुँचा सकें। उनकी भाषा में कोई बनावटीपन नहीं है;
जहाँ जैसे शब्द की ज़रूरत हुई, लेखिका ने वहीं
उन शब्दों को खड़ा कर दिया है। इस उपन्यास की मुख्य भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है,
परंतु लेखिका ने ग्रामीण परिवेश और पात्रों के सामाजिक स्तर को
जीवंत बनाने के लिए इसमें मगही और भोजपुरी के आंचलिक शब्दों और मुहावरों का सहज
समन्वय किया है। मुझे लगता है कि संवादों की स्वाभाविकता इस उपन्यास की सबसे बड़ी
शक्ति है, जहाँ ग्रामीण पात्र अपनी ठेठ देसी बोली में बात
करते हैं, जैसे टीकाधारी मास्टर द्वारा रमिया को पीटने का
प्रसंग या ग्रामीण महिलाओं के वार्तालाप। ठीक इसके विपरीत, जब
नायिका रमिया या उसकी सहेली श्यामली सामाजिक न्याय और अंबेडकरवादी सिद्धांतों पर
चर्चा करती हैं, तो भाषा तत्सम प्रधान और वैचारिक रूप से
प्रखर हो जाती है, जो उनके शिक्षित और जागरूक व्यक्तित्व को
रेखांकित करती है। उपन्यास में वर्णनात्मक और विमर्शात्मक शैलियों का अत्यंत प्रभावशाली
मिश्रण किया है। उपन्यास की पृष्ठभूमि में पुनपुन नदी के किनारे का यथार्थवादी
चित्रण, नदी की विनाशकारी बाढ़ और सन् 1967 के भीषण अकाल का मर्मस्पर्शी वर्णन लेखिका की सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता
को दर्शाता है। इस तरह का भौगोलिक और प्राकृतिक विवरण जिससे वातावरण सजीव हो उठता
है, साथ ही पात्रों के आर्थिक और सामाजिक संघर्ष को भी प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। इसके
साथ ही, उपन्यास के शिल्प में वैचारिक विमर्श का महत्वपूर्ण
स्थान है, जहाँ जातिवाद, मानवाधिकार और
शिक्षा के महत्व पर लंबी बहसें अंबेडकरवादी चेतना को पाठकों तक पहुँचाने का सशक्त
माध्यम बनती हैं।
वतर्मान में दलित साहित्य के शिल्प पर बात नहीं होती, क्योंकी दलित साहित्य एक
आंदोलन है, और आंदोलन का कोई शिल्प नहीं होता है, फिर ही मूल्यांकन की बाध्यता
शिल्प पर बात करने के लिए विवश करता है। शिल्प
की दृष्टि से इस उपन्यास में 'मेटा-फिक्शन'
का प्रयोग सराहनीय है, जिसमें 'चोर' नामक नाटक का मंचन पूरी कथावस्तु का एक लघु
प्रतिबिंब बनकर उभरता है और व्यवस्था की निर्दयता को उजागर करता है। लेखिका ने
शिल्प को लोक संस्कृति के रंगों में डुबोकर सजाया है, जिसमें
झूमर, सोहर और विदाई गीतों का प्रयोग आंचलिकता के साथ-साथ
पात्रों की आंतरिक मनोदशा को व्यक्त करने के लिए किया गया है। लेखिका ने स्वप्न और
स्मृतियों का कलात्मक उपयोग कथानक को और भी प्रवाहोत्पादक बना देता है, जैसे श्यामली के विवाह के स्वप्न या रमिया की पुरानी यादें। उपन्यास की
तेरह खंडों में विभाजित संरचना नायिका रमिया के व्यक्तित्व के क्रमिक विकास ‘बचपन
के अपमान से लेकर एक स्वाभिमानी शिक्षिका बनने तक’ को स्पष्टता से प्रस्तुत करती
है। अंततः, यह उपन्यास भाषाई स्थानीयता और शिल्प की नवीनता
के माध्यम से दलित और स्त्री जीवन के मर्म को सफलतापूर्वक संप्रेषित करता है।
लेखिका भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और पितृसत्तात्मक बेड़ियों को तोड़कर दलित और नारी चेतना को जागृत
करती है। इस उपन्यास की वैचारिकी पूरी तरह से डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और बिरसा मुंडा के दर्शन पर आधारित है, जिसका केंद्र बिंदु ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और
संघर्ष करो’ का प्रसिद्ध नारा है। लेखिका ने इसके माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया
है कि शिक्षा ही वह एकमात्र अस्त्र है जिससे दलित और उपेक्षित वर्ग अपनी खोई हुई
मानवीय गरिमा को पुनः प्राप्त कर सकता है। रमिया का चरित्र इस विचारधारा का जीवंत
प्रमाण है, जो बचपन के अपमान से लेकर व्यावसायिक जीवन की
चुनौतियों तक अपनी योग्यता और शिक्षा के बल पर समाज में अपना स्थान सुरक्षित करती
है।
आलोचनात्मक दृष्टकोण से जब इस कृति का मूल्यांकन करने पर, पाते हैं कि यह कृति
हिंदी दलित साहित्य में 'पीड़ा' के चित्रण से आगे बढ़कर 'प्रतिरोध और पुनर्निर्माण'
का एक उदाहरण प्रस्तुत करती है। इसकी सबसे बड़ी सफलता यथार्थवादी और
आंचलिक चित्रण है, जहाँ लेखिका ने बिहार के ग्रामीण परिवेश,
पुनपुन नदी की बाढ़ और सन् 1967 के भीषण अकाल
की पृष्ठभूमि को सामाजिक शोषण के साथ अत्यंत सूक्ष्मता से जोड़ा है। उपन्यास की
नायिका, रमिया एक दलित पात्र उस चेतना का प्रतीक है जो
शिक्षा को ही अपमान और अन्याय से मुक्ति का एकमात्र अस्त्र मानती है। बचपन में
प्यास बुझाने के लिए बाल्टी छूने पर मिली प्रताड़ना उसे तोड़ने के बजाय डॉ. अंबेडकर
के ‘शिक्षित बनो’ के संकल्प की ओर ले जाती है, जो इस उपन्यास
की वैचारिकी का मुख्य आधार स्तंभ है। लेखिका ने रमिया और श्यामली की मित्रता के
माध्यम से यह संदेश दिया है कि जातिगत श्रेष्ठता के बोध से ऊपर उठकर ही एक
समतामूलक समाज का निर्माण संभव है। उपन्यास की भाषा में मगही और भोजपुरी की
आंचलिकता संवादों को जीवंत और विश्वसनीय बनाती है, जिससे
पाठक स्वयं को उस परिवेश का हिस्सा महसूस करने लगता है। हालाँकि, कथा के मध्य में वैचारिक विमर्श और लंबी बहसें कभी-कभी कथा के प्रवाह को
धीमा कर देती हैं और उपदेशात्मक प्रतीत होने लगती हैं, लेकिन
नायिका के व्यक्तित्व का क्रमिक विकास इन कमियों को ढक लेता है। उपन्यास का
चरमोत्कर्ष जहाँ रमिया अपने अपमानकर्ता को कानून के शिकंजे में कसने के बाद अंततः
क्षमा कर देती है। अंबेडकरवादी मानवतावाद की उस पराकाष्ठा का प्रतीक है, जहाँ जीत
अहंकार की नहीं, नैतिक श्रेष्ठता की होती है। अंततः, 'मिस
रमिया' आधुनिक समाज के लिए एक वैचारिक घोषणापत्र है, जो दलित-स्त्री को 'पीड़ित' के
बजाय एक 'सशक्त नायक' के रूप में
प्रतिष्ठित करता है।
अतएव, यह उपन्यास दलित समाज के लिए प्रेरणादायक और दूरगामी प्रभाव डालने वाला
है, जो एक दलित बालिका की सफलता की कहानी मात्र
न होकर भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का एक वैचारिक घोषणापत्र बनकर उभरता है। शिक्षा
ही वह 'शेरनी का दूध' है, जिसे पीकर रमिया जैसा कोई भी वंचित पात्र अपने अधिकारों के लिए दहाड़ सकता
है; लेखिका ने यह बखूबी सिद्ध किया है कि सामाजिक और आर्थिक
पिछड़ेपन की बेड़ियों को एक मात्र ज्ञान और योग्यता के बल पर ही काटा जा सकता है।
यह कृति बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित
रहो और संघर्ष करो’ के नारे को काल्पनिक धरातल पर जीवंत करती है और संदेश देती है
कि वैचारिक जागरूकता के बिना गुलामी की जंजीरों को पहचानना असंभव है। इस तरह, कावेरी
जी ने 'मिस रमिया' के माध्यम से
दलित-स्त्री चेतना को एक नया आयाम दिया है, जहाँ नायिका 'पीड़ित' या 'अबाला' जैसे शब्दों के बंधन से मुक्त, कानून की जानकार और समाज को दिशा देने वाली
एक स्वाभिमानी शक्ति है। इस उपन्यास विशेष बात यह है जो विशेषकर मुझे प्रभावित
किया है कि उपन्यास का अंत प्रतिशोध के बजाय 'क्षमादान'
और मानवता से होता है, दलित चेतना का वास्तविक
उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि एक ऐसे मानवतावादी समाज की स्थापना करना
है जहाँ प्रेम और करुणा की जीत हो। अंततः, रमिया और श्यामली
की अटूट मित्रता सामाजिक समरसता की वह उम्मीद जगाती है जहाँ सवर्णों की
संवेदनशीलता और दलितों की शिक्षा मिलकर जातिवाद को जड़ से मिटा सकते हैं। बहरहाल,
यह उपन्यास साहित्यिक कृति से ऊपर उठाकर सामाजिक परिवर्तन का एक मजबूत माध्यम
बनाती है जो सामाजिक धरातल पर दलित अस्मिता को नया गौरव प्रदान किया है और 'पीड़ित' की पारंपरिक छवि को तोड़कर एक 'सक्षम और शिक्षित पेशेवर' की पहचान स्थापित करती है,
जिससे वंचित समाज में आत्म-सम्मान और शिक्षा के प्रति एक नई चेतना
का संचार हुआ है।
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