'रश्मीरथी' के 75 वर्ष और कर्ण का आत्ममंथन

डॉ. अजय चौधरी

एसोसियट प्रोफेसर

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रामधारी सिंह 'दिनकर' का खंडकाव्य अपने रचनाकाल के 75वें वर्ष के आँकड़े को पार कर प्लैटिनम जुबली में प्रवेश कर गया है। कोई भी रचना जब अपने समय के साथ समकालीनता को समेटे आगे बढ़ती है, तो वह कालजयी रचनाओं में शामिल हो जाती है। आज की वर्तमान स्थिति का आकलन और संघर्ष की जो मिसाल हम देख पाते हैं, वह 'रश्मीरथी' में पूरी तरह मौजूद है। रचना अपनी प्रासंगिकता तब खो देती है, जब वह समय की सुइयों की होड़ में पीछे रह जाती है। कितनी ही रचनाएँ अपनी प्रासंगिकता खो बैठी हैं, इस बात की चर्चा से आगे बढ़कर अब 'रश्मीरथी' की प्रासंगिकता और उसके नायक कर्ण के संघर्ष, आत्मचिंतन और आत्ममंथन पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इस रचना पर पहली बार कोई बात रखी जा रही है— इस पर न जाने कितनी आलोचनाएँ और समीक्षाएँ आ चुकी हैं; फिर भी हर रचना को अपने समय के सापेक्ष देखने का एक नया नज़रिया होता है, जो काल और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।

इस रचना का प्लैटिनम जुबली में कदम रखना इस बात की तस्दीक है कि कुछ रचनाएं वक्त की धूल से धुंधली पड़ने के बजाय चमकदार हो जाती हैं। आज जब हम अपने आस-पास के समाज को देखते हैं, तो लगता है कि महाभारत का वह कुरुक्षेत्र कहीं गया नहीं है, वह आज भी हमारे भीतर और बाहर वैसे ही मौजूद है। दिनकर जी की यह कृति आज भी उतनी ही मौजूं, उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 1952 में रही होगी।

सवाल उठता है कि आख़िर कोई रचना ‘कालजयी’ कैसे बनती है? इतिहास गवाह है कि कई किताबें अपने दौर में बहुत शोर मचाती हैं, लेकिन वक्त की तिल्लियों की होड़ में, समय के थपेड़ों के आगे घुटने टेक देती हैं और बिसरा दी जाती हैं। रश्मीरथी के साथ ऐसा नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि दिनकर ने इसमें इंसान के शाश्वत संघर्ष, उसके वजूद की लड़ाई को पन्नों पर उकेरा है। आइए, इस संवाद को थोड़ा गहराई में ले चलें और बात करें इस महागाथा के नायक—कर्ण की। कर्ण का पूरा जीवन एक मुसलसल संघर्ष की दास्तान है। वह एक ऐसे समाज से लड़ रहा है जो इंसान की क़ाबलियत, उसके हुनर और उसकी शख़्सियत को छोड़कर उसकी जाति और खानदान का वंशवृक्ष ढूंढता है। जब रंगभूमि में कर्ण अपनी वीरता का प्रदर्शन करता है, तो कृपाचार्य और भीष्म उसकी योग्यता को सराहने के बजाय उसकी जाति पूछकर उसे ज़लील करते हैं। आज 75 साल बाद भी क्या हमारा समाज इस मानसिकता से पूरी तरह आज़ाद हो पाया है? आज भी हाशिए पर खड़ा इंसान जब अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाता है, तो यह इलीट क्लास, यह व्यवस्था उसकी पृष्ठभूमि पर सवाल खड़ा कर देती है। यही वजह है कि कर्ण का दर्द आज के आम इंसान का दर्द बन जाता है।

लेकिन रश्मीरथी की असली ख़ूबसूरती बाहरी संघर्ष में नहीं है; इसका असली रूप कर्ण के 'आत्मचिंतन' और 'आत्ममंथन' में है। कर्ण कोई सपाट चरित्र नहीं है कि बस तीर चलाया और बात ख़त्म। उसके भीतर एक अंतर्द्वंद्व की नदी बहती है। वह जानता है कि दुर्योधन ग़लत है, वह अधर्म के रास्ते पर है। लेकिन दूसरी तरफ़ एहसान का वह बोझ है, उस दोस्ती का तकाज़ा है जिसने उसे तब अपनाया जब पूरी दुनिया उसे 'सूतपुत्र' कहकर दुत्कार रही थी।

जब भगवान कृष्ण उसे पांडवों की तरफ़ आने का प्रलोभन देते हैं, उसे चक्रवर्ती सम्राट बनने का लालच देते हैं, तब कर्ण का आत्ममंथन अपनी पराकाष्ठा पर होता है। वह किसी लोभ में नहीं आता। वह कृष्ण से कहता है—

‘प्रासाद के कनकाभ शिकर, होते कबूतरों के ही घर,

महलों में गरुड़ न होता है, कंचन पर कभी न सोता है।’

कर्ण का यह आत्मचिंतन सिखाता है कि जब पूरी कायनात ख़िलाफ़ खड़ी हो, जब हर तरफ़ से समझौते के रास्ते खुल रहे हों, तब अंतरात्मा की आवाज़ को कैसे ज़िंदा रखा जाता है। वह जानता है कि उसकी मौत तय है, वह जानता है कि इतिहास उसे शायद उस तरह याद न रखे, फिर भी वह वफ़ादारी और अपने सिद्धांतों की खातिर कुरुक्षेत्र के मैदान में उतरता है।

रश्मीरथी एक खंडकाव्य के रूप में समाज का एक आईना है। जब-जब समाज में योग्यता को दबाया जाएगा, जब-जब दोस्ती और वफ़ादारी की परीक्षा होगी, और जब-जब इंसान अपने भीतर के उजाले और अंधेरे से लड़ेगा, कर्ण का यह आत्ममंथन रास्ता दिखाता रहेगा। यही इस रचना की मुकम्मल कामयाबी है कि यह आज भी हमारे हृदयों में उतनी ही तीव्रता से धड़क रही है।

इस रचना के प्लेटिनम जुबली के इस पड़ाव पर आकर जब इसकी प्रासंगिकता के पन्नों को और भी गहराई से टटोलते हैं, तो यह बात साफ़ हो जाती है कि दिनकर जी ने खंडकाव्य के रूप में आने वाली सदियों के इंसानी वजूद का एक मुकम्मल नक्शा खींच दिया था। इस रचना की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि यह सदियों पुरानी सामाजिक सड़ांध पर चोट करती है, जो आज भी नए-नए रूपों में हमारे सामने खड़ी है। रंगभूमि का दृश्य याद कीजिए— जहाँ हुनर का उत्सव होना चाहिए था, वहाँ कुलीनता का घमंड नाच रहा था। कृपाचार्य जब कर्ण से उसका परिचय, उसकी जाति पूछते हैं, तो वह दृश्य आज के दौर के उस इंटरव्यू बोर्ड या कॉर्पोरेट के उस बंद कमरे जैसा लगता है, जहाँ किसी नौजवान की काबलियत उसकी 'सिफ़ारिश' या 'बैकग्राउंड' के तराज़ू पर तौली जाती है। कवि ने कर्ण के माध्यम से जो तीखा प्रहार किया, वह आज के हर उस इंसान की हुंकार है जिसे हाशिए पर धकेल दिया गया है:

‘पूछता है सूतपुत्र कौन हैं हम?

जो कुछ भी हैं, बस अपने बदौलत हैं हम।’

आज का युवा जब जाति, वर्ग, और नस्ल के बंधनों को तोड़कर अपनी मेधा के दम पर 'स्टार्टअप' खड़ा करता है या किसी ऊंचे मुकाम पर पहुँचता है, तो वह अनजाने में रश्मीरथी के उसी संकल्प को दोहरा रहा होता है।

यहाँ कर्ण और दुर्योधन का रिश्ता राजनीति और समाजशास्त्र का एक बेहद पेचीदा अध्याय है। इसे 'अच्छी दोस्ती' कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। दुर्योधन ने कर्ण को अंगदेश का राजा इसलिए नहीं बनाया था कि वह कोई बहुत बड़ा न्यायप्रिय राजा था, बल्कि वह कर्ण के पराक्रम को अपने हक़ में इस्तेमाल करना चाहता था। यह आज के दौर का 'क्रोनियिज़्म' है, जहाँ ताकतवर लोग कमज़ोर लेकिन प्रतिभाशाली लोगों पर उपकार करते हैं और बदले में उनकी आत्मा को गिरवी रख लेते हैं।

कर्ण इस जाल को समझता है। उसका आत्ममंथन यहाँ बहुत गंभीर है। वह जानता है कि दुर्योधन की नीतियाँ अधर्मी हैं, वह यह भी जानता है कि इतिहास उसे एक खलनायक के मददगार के रूप में देखेगा। लेकिन उसका ज़मीर कहता है कि जिस दुनिया ने उसे दुत्कार दिया था, वहाँ अगर एक शख़्स ने उसे गले लगाया, तो अब बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ना सबसे बड़ी बुज़दिली और गद्दारी होगी। यह 'एथिकल डिलेमा' आज के हर उस दलित नेता  की है जो किसी भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा तो है, लेकिन उस व्यवस्था के पुराने अहसानों या मजबूरियों के चलते विद्रोह नहीं कर पाता।

आज का हमारा समाज पूरी तरह से बाज़ार और प्रलोभनों पर टिका है। हर चीज़ की एक क़ीमत तय कर दी गई है—सिद्धांतों की भी, वफ़ादारी की भी। ऐसे 'सेल' वाले दौर में रश्मीरथी का तीसरा सर्ग— कृष्ण-कर्ण संवाद, एक वैचारिक ढाल बनकर खड़ा होता है। जब कृष्ण कर्ण को पांडवों का ज्येष्ठ होने का सच बताते हैं और कहते हैं कि ‘चलो, युधिष्ठिर तुम्हारे चरण धोएगा, तुम चक्रवर्ती सम्राट बनोगे,’ तो यह आज के दौर का सबसे बड़ा 'ऑफ़र' है। किसी भी आम इंसान का ईमान यहाँ डगमगा सकता है। लेकिन कर्ण का जवाब सुनिए,

“वैभव विलास की चाह नहीं, अपनी कोई परवाह नहीं।

बस यही चाहता हूँ केवल, दान की देवसरिता निर्मल,

करतल से झरती रहे सदा, निर्धन को भरती रहे सदा।”

कर्ण का यह इंकार आज के उस दौर में बेहद प्रासंगिक है जहाँ लोग एक अदद प्रमोशन, एक राजनीतिक टिकट या थोड़े से आर्थिक फ़ायदे के लिए अपनी विचारधारा और ज़मीर का सौदा कर लेते हैं। कर्ण सिखाता है कि कुछ चीजें 'नॉट फॉर सेल' होती हैं।

आजकल की पीढ़ी बहुत जल्दी अवसाद और हताशा का शिकार हो जाती है। ज़रा सी असफलता हमें तोड़ देती है। कर्ण का चरित्र इस मानसिक कमज़ोरी की सबसे बेहतरीन दवा है। कर्ण का पूरा जीवन रिजेक्शन की कहानी है। माँ ने गंगा में बहा दिया, गुरु परशुराम ने श्राप दे दिया, धरती माँ ने रथ का पहिया ग्रस लिया और इंद्र ने कवच-कुंडल छल से मांग लिए। प्रकृति और नियति का हर क्रूर मज़ाक उसके साथ हुआ। अगर कोई और होता तो कब का अवसाद में डूबकर मैदान छोड़ चुका होता। लेकिन कर्ण का 'आत्मचिंतन' उसे एक योद्धा बनाए रखता है। वह अपनी नियति से रोकर या भीख मांगकर शिकवा नहीं करता है, वह सीना तानकर कहता है कि अगर क़िस्मत ने मेरे ख़िलाफ़ साज़िश रची है, तो मैं अपने पुरुषार्थ से उस साज़िश को नाकाम करूँगा। कुरुक्षेत्र के मैदान में कवच-कुंडल के बिना, श्रापों के बोझ तले दबा हुआ वह शख़्स जब लड़ता है, तो हारकर भी जीत जाता है। आज के संघर्षरत युवाओं के लिए कर्ण का यह जज़्बा एक मुकम्मल गाइडबुक है।

समीक्षकों ने रश्मीरथी पर बहुत कुछ लिखा है, लेकिन समय के सापेक्ष इसका हर पाठ नया अर्थ देता है। 75 साल पहले यह काव्य आज़ादी के बाद के नए भारत के सामाजिक अंतर्विरोधों को रेखांकित कर रहा था; आज 2026 में यह हमारे भीतर के कुरुक्षेत्र और नैतिक पतन के ख़िलाफ़ एक अलार्म की तरह बज रहा है। जब तक इस दुनिया में हुनरमंदों को अपनी पहचान के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी, जब तक सत्ता और नैतिकता के बीच तलवारें खिंची रहेंगी और जब तक इंसान प्रलोभनों के आगे अपने ज़मीर को ज़िंदा रखने की कोशिश करेगा—तब तक रश्मीरथी की यह आग ठंडी नहीं होगी। यह वक्त की धूल को झाड़कर हर दौर में समकालीन बनी रहेगी।

आज के दौर में ‘रश्मीरथी’ कड़वी हक़ीक़त की स्वीकारोक्ति है जिसे हम सब रोज़ जीते हैं। सच तो यह है कि आज के इस मतलबी और तेज़ रफ़्तार दौर में हममें से हर शख़्स किसी न किसी मोड़ पर खुद को कर्ण की भूमिका में खड़ा पाता है। हम सब अपने हिस्से का 'कवच-कुंडल' दान कर रहे हैं—कभी अपने किसी अज़ीज़ की खातिर, कभी अपने उसूलों को ज़िंदा रखने के लिए, तो कभी उस दफ़्तर या व्यवस्था के लिए जिसे हमने अपना ख़ून-पसीना दिया। और विडंबना देखिए, यह जानते हुए भी कि सामने खड़ी दुनिया हमारे इस त्याग का बेजा फ़ायदा उठा सकती है, हमारे पैर पीछे नहीं हटते। यही इंसान होने की सबसे ख़ूबसूरत और सबसे दर्दनाक शर्त है।

जब हम अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर किसी शॉर्टकट या ग़लत रास्ते को ठुकराते हैं, तो वह प्रलोभन को लात मारने वाला 'कृष्ण-कर्ण संवाद' हमारे ही भीतर चल रहा होता है। उस वक़्त भले ही हम दुनिया की नज़रों में बेवकूफ़ साबित हों, लेकिन अपनी नज़रों में हम कुरुक्षेत्र जीत चुके होते हैं। दिनकर जी की 'रश्मीरथी' की यही सबसे बड़ी कामयाबी है। यह 75 साल बाद भी किसी किताब की अलमारी में बंद एक बेजान कहानी की तरह नहीं है; यह हमारे अंदर चल रहे इसी अंतर्द्वंद्व का, इसी कशमकश का एक ज़िंदा और धड़कता हुआ अक्स है। जब तक हमारे भीतर यह आत्ममंथन ज़िंदा है, कर्ण की साख और रश्मीरथी की लपट कभी ठंडी नहीं हो सकती।

आज की राजनीति में 'शकुनि और दुर्योधन' की बाढ़ आ गई है और 'कर्ण' जैसी नैतिक वफ़ादारी ढूँढे नहीं मिलती— यही आज के दौर का सबसे बड़ा सियासी और सामाजिक संकट है। 75 साल पहले जब दिनकर जी 'रश्मीरथी' लिख रहे थे, तब शायद उनके ज़हन में आज़ाद भारत की राजनीति का एक धुंधला सा ख़ौफ़ था, जो आज 2026 में एक मुकम्मल और नग्न हक़ीक़त बनकर हमारे सामने खड़ा है। महाभारत का शकुनि पाँसे फेंकता था, लेकिन आज की राजनीति के 'आधुनिक शकुनि' पाँसे नहीं, 'नैरेटिव' फेंकते हैं। आज किसी भी दल के पीछे बैठे जो रणनीतिकार और आईटी सेल के सिपहसालार हैं, वे शकुनि का ही नया रूप हैं। उनका काम सच को झूठ और झूठ को सच साबित करना है। शकुनि ने जिस तरह चौसर की बिसात पर पांडवों को छला था, आज डिजिटल मीडिया, प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज़ की बिसात पर जनता के दिमाग़ को छला जा रहा है। समाज में नफ़रत के जो पाँसे फेंके जाते हैं, उनका मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्ता की बाज़ी जीतना होता है, चाहे उसमें पूरे देश के सौहार्द का चीरहरण ही क्यों न हो जाए।

दुर्योधन 'असीमित अहंकार' का प्रतीक है जो किसी की नहीं सुनता। जब भगवान कृष्ण शांति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर की सभा में आते हैं और पाँच गाँव जैसी मामूली शर्त रखते हैं, तब दुर्योधन का हठ अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है:

‘सूच्यग्र न दूंगा मैं भूतल, चाहे जो हो जाए निश्चय।’

आज की राजनीति में भी यही हठधर्मी दिखाई देती है। जब सरकारें या सत्ता में बैठे लोग विपक्ष की आवाज़, जनता के आंदोलनों या अदालतों के फैसलों को अपने अहंकार के आगे तिनके बराबर समझने लगते हैं, तो वह दुर्योधन का ही रूप होता है। और इससे भी आगे बढ़कर, जब दुर्योधन कृष्ण को ही बांधने के लिए सांकल उठा लाता है—’उलटे हरि को बांधने चला, जो था असाध्य, साधने चला’—तो यह आज के दौर में स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं मीडिया, न्यायपालिका, जाँच एजेंसियों को सत्ता के शिकंजे में कसने की साज़िश जैसा लगता है। सत्ता सोचती है कि वह हर उस आवाज़ को 'बाँध' लेगी जो उसे आईना दिखाती है।

आज की राजनीति में वफ़ादारी एक मज़ाक बन कर रह गई है। सुबह जो नेता किसी विचारधारा के लिए जान देने की कसमें खाता है, शाम को वह विरोधी दल का पट्टा गले में डाले प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा होता है। आज 'रिफंड' और 'रिवॉर्ड' की राजनीति है—जिसका पलड़ा भारी, नेता उधर ही खिंचा चला जाता है। ऐसे में कर्ण का चरित्र एक अचंभे जैसा लगता है। कर्ण को पता था कि दुर्योधन अधर्मी है, उसे यह भी पता था कि अर्जुन के हाथों उसकी मौत तय है, और जब कृष्ण ने उसे पांडवों का राजा बनाने का 'बंपर ऑफ़र' दिया, तब भी उसने अपनी वफ़ादारी का सौदा नहीं किया। उसने कृष्ण से साफ़ कहा:

‘जिस दुर्योधन ने पाला है, विपदा से मुझे निकाला है,

उसके हित जान गँवाऊँगा, कुरुक्षेत्र में ऋण चुकाऊँगा।’

कर्ण की यह वफ़ादारी आज की राजनीति में इसलिए नहीं मिलती क्योंकि आज की राजनीति में 'ऋण चुकाने' की नीयत ख़त्म हो चुकी है, अब सिर्फ़ 'मुनाफ़ा कमाने' की होड़ है। आज के नेता कर्ण की तरह कुरुक्षेत्र में मरना नहीं चाहते, वे हर हाल में सत्ता की मलाई का हिस्सा बने रहना चाहते हैं। क्या आज की राजनीति में कर्ण जैसे लोग बिल्कुल नहीं हैं? हैं, लेकिन वे उस 'ईमानदार कार्यकर्ता' के रूप में बिखरे पड़े हैं, जो अपनी पार्टी की विचारधारा से बरसों-बरस वफ़ादार रहता है। वह लाठियाँ खाता है, दरी बिछाता है, नारे लगाता है। लेकिन जब टिकट बटने का वक़्त आता है, तो कोई अमीर बिज़नेसमैन या किसी नेता का बेटा पैराशूट से आकर उसकी जगह ले लेता है। आज का सच्चा हुनरमंद और वफ़ादार इंसान सिस्टम के इस अंतर्विरोध में पिस रहा है। उसे अपने सिद्धांतों की खातिर अपने हिस्से का 'कवच-कुंडल' दान करना पड़ता है, लेकिन बदले में व्यवस्था उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ छलावा देती है।

आज के कुरुक्षेत्र संसद, विधानसभाओं और चुनावी रैलियों को देखते हैं, तो दिल दहल जाता है कि दिनकर जी की चेतावनी आज कितनी सच साबित हो रही है। जब समाज में शकुनि की चालबाज़ियाँ 'मास्टरस्ट्रोक' मान ली जाएँ, जब दुर्योधन का हठ 'मज़बूत नेतृत्व' कहलाने लगे, और जब कर्ण जैसी वफ़ादारी को 'बेवकूफ़ी' कहा जाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि विनाश का कालखंड बहुत नज़दीक है:

‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।’

इस मुकम्मल सियासी परिदृश्य में, आपको क्या लगता है कि इस 'विवेक' को वापस जगाने की ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या आज की जनता में वह दम है कि वह दुर्योधन के हठ को तोड़ सके, या हम सब मूकदर्शक बने भीष्म और धृतराष्ट्र की तरह इस विनाश लीला को देखने के लिए अभिशप्त हैं?

रश्मीरथी महाभारत के एक पात्र की कर्ण की कहानी के रूप में यह हर उस युग का प्रमाण है जहाँ 'विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग' अपनी सत्ता को बचाने के लिए किसी 'कर्ण' यानी आम पृष्ठभूमि से आए हुनरमंद की योग्यता को कुचलने की साज़िश रचता है। रंगभूमि का वह दृश्य आज भी हमारे दफ़्तरों, अकादमियों और सियासत के गलियारों में रोज़ दोहराया जाता है। जब तक समाज में योग्यता की जगह वंश और जाति को तरजीह दी जाएगी, तब तक व्यवस्था के ख़िलाफ़ यह प्रतिरोधी आवाज़ गूंजती रहेगी।

आज के उस दौर में जहाँ राजनीति और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में 'ज़मीर का सौदा' और 'दलबदल' एक आम बात हो चुकी है कर्ण की नैतिक अडिगता एक दुर्लभ आदर्श है। कृष्ण-कर्ण संवाद प्रलोभनों के बाज़ार में आत्मसम्मान को बचाए रखने की सबसे बड़ी मिसाल है। कर्ण का चरित्र बताता है कि जीत हमेशा कुरुक्षेत्र के मैदान में रथ पर बैठकर मुकुट पहनने से नहीं मिलती; कई बार अपनी वफ़ादारी और सिद्धांतों की खातिर हँसते-हँसते सब कुछ गंवा देने वाला हारा हुआ योद्धा भी इतिहास में कालजयी हो जाता है।

वर्तमान सियासत में जब हम शकुनि की चालबाज़ियों को कूटनीति का नाम देते हैं और दुर्योधन के हठ को मज़बूत नेतृत्व मान लेते हैं, तब रश्मीरथी चेताती है कि यह 'विवेक के मर जाने' का लक्षण है। आज की जनता भीष्म और धृतराष्ट्र की तरह मौन रहकर इस पतन को देखने के लिए अभिशप्त नहीं रह सकती। अगर समाज को विनाश से बचाना है, तो धृतराष्ट्र की आँखों की पट्टी खोलनी ही होगी।

दिनकर जी की यह पंक्ति—‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो’— इस पूरी आलोचना का मूल मंत्र है। शक्ति के बिना शांति का राग अलापना कायरता है। रश्मीरथी का संदेश साफ़ है: पहले खुद को समर्थ और ताक़तवर बनाओ, अपने भीतर के अंतर्द्वंद्व और अवसाद से लड़ो, और जब पूरी दुनिया तुम्हारे ख़िलाफ़ साज़िश रच रही हो, तब भी अपने हिस्से का 'कवच-कुंडल' दान करने का हौसला और अपने ज़मीर की आवाज़ को ज़िंदा रखो। यही इस कालजयी कृति की आज के दौर में मुकम्मल प्रासंगिकता है।

 

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