फल्गु के कछार से संघर्ष, चेतना और यथार्थ
डॉ. अजय चौधरी
मोब:
8981031969
आत्मकथा लिखना एक चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा कार्य है।
आत्मकथाकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि जीवन के किन प्रसंगों को दर्ज
किया जाए और किसे छोड़ दिया जाए। इसी मोड़ पर उसकी ईमानदारी दांव पर लगती है। व्यक्ति
जीवन की कुछ ऐसी व्यक्तिगत घटनाओं और कटु स्मृतियों को मस्तिष्क के किसी कोने में
दबाकर रखता है, जिससे दुनिया अनजान होती है। परंतु जब आत्मकथा लेखन
का क्षण आता है, तो ये सुप्त स्मृतियां स्वतः स्फूर्त होकर बाहर निकल
आती हैं। लेखक का व्यक्तिगत पक्ष जब सार्वजनिक होता है, तो वह एक व्यक्ति की कहानी न रहकर संपूर्ण समाज और समूह के अनुभवों से जुड़कर
सत्य की प्रामाणिकता को उजागर करता है। दलित लेखन में आत्मकथाएँ एक
व्यक्ति का स्व-वृत्तांत के रूप में समाज की प्रामाणिक घटना प्रस्तुत करती हैं, जिससे पूरा समाज परिचित हो पाता है। मूल रूप से इसमें समाज द्वारा किए गए
उत्पीड़न, अपमान और एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के प्रति निभाई
गई अंतर्भावनाओं का प्रत्यक्ष चित्रण होता है। विपिन बिहारी की आत्मकथा 'फल्गु के किनारे' भी इसी सामाजिक और व्यक्तिगत यथार्थ को एक सहज और प्रवाहमय लहजे में सामने
लाती है।
फल्गु नदी पानी की धारा एक अकीदत, अफ़साने और सदियों पुराने श्राप का एक ऐसा सिलसिला है, जो इतिहास और
पौराणिक कथाओं के पन्नों में गंभीरता से रचा-बसा है।
पौराणिक मान्यताओं की मानें तो फल्गु को एक शापित नदी माना गया है, जिसे 'अंतःसलिला' भी कहते हैं—यानी एक ऐसी नदी जो सतह पर तो बिल्कुल सूखी और
बंजर नज़र आती है, लेकिन उसकी असल जलधारा ज़मीन के नीचे-नीचे ख़ामोशी से बहती रहती है। इसके पीछे
एक मशहूर अफ़साना जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि बनवास के दिनों में जब श्रीराम और
लक्ष्मण अपने पिता राजा दशरथ के पिंडदान के लिए गया पहुँचे, तो सामग्री जुटाने
बाज़ार चले गए। इधर पिंडदान का वक्त निकला जा रहा था और राजा दशरथ की आत्मा
पिंडदान की तलब कर रही थी। तब सीता जी ने घड़ी की नज़ाकत को देखते हुए फल्गु नदी, वटवृक्ष, कौए और तुलसी को
गवाह बनाकर खुद ही पिंडदान की रस्म निभा दी। लेकिन जब राम और लक्ष्मण वापस लौटे और
सीता जी ने गवाहों से पूछताछ करने को कहा, तो फल्गु नदी ने साफ़ मुकरते हुए झूठ बोल दिया कि कोई
पिंडदान नहीं हुआ है। फल्गु की इस असत्य से गुस्सा होकर सीता जी ने उसे ताउम्र सतह
पर सूखे रहने का श्राप दे दिया। इसी वजह से फल्गु का चेहरा ऊपर से रेत का एक वीरान
सहरा दिखता है, जबकि उसका दिल अंदर से तर रहता है।
इसी रहस्यमयी फल्गु नदी के पूर्वी किनारे से ज़रा हटकर बसा है—'पचमहला' गाँव, जो बिहार के गया ज़िले के खिजरसराय प्रखंड में आता है। यही
गाँव इस आत्मकथा के लेखक का जन्मस्थान और उनके बचपन की तमाम कड़वी-मीठी यादों का
आशियाना है। इस गाँव का नाम 'पचमहला' क्यों पड़ा, इसका कोई ठोस ऐतिहासिक या पुरातात्विक सबूत तो मयस्सर नहीं
है, बस वर्षों से चली आ
रही जनश्रुतियों और अटकलों के सहारे लोग कहते हैं कि यहाँ कभी कोई पंच महल हुआ
करता था। पचमहला गाँव की पहचान यह है कि यह किसी एक रंग में रंगने के बजाय जातियों
के अलग-अलग टोलों में बँटा हुआ है। गाँव का भूगोल देखें तो पूर्व की तरफ़ यादव और
कोइरी बिरादरी का टोला है, तो पश्चिम में एक तरफ़ मुसलमानों की आबादी और दूसरी तरफ़ दलितों मुख्यतः दुसाध
और चमार जाति का दुसधटोली बसा है। हैरत की बात यह है कि इस पूरे गाँव में सवर्ण
जाति का कोई भी घर मौजूद नहीं था—गाँव का पूरा ताना-बाना दलित, पिछड़े और मुस्लिम तबके
के ताल्लुक़ात से ही बुना गया था। इस गाँव के सीने को चीरती हुई गया-पटना की मुख्य
सड़क गुजरी है, जो गाँव को दो टुकड़ों में बाँटती नज़र आती है। बस इसी फल्गु के बहते कछार और
पचमहला की गलियों के बीच लेखक के जीवन और समाज का वह ताना-बाना आकार लेता है, जहाँ एक तरफ़
लोक-संस्कृति की सोंधी महक है तो दूसरी तरफ़ सामाजिक असमानता की कड़वी हक़ीक़त।
जिंदगी का आगाज़ भी बड़े अजीब इत्तेफ़ाक़ों और
संघर्षों की ज़मीन पर होता है। आत्मकथा के पन्नों में लेखक के जन्म का ज़िक्र भादो
महीने की सोमवारी अमावस्या का है, जब शीतल पासवान और चमेली देवी के
घर में दूसरे बेटे की किलकारी गूंजी। हालाँकि लिखित तौर पर स्कूल के दाखिला
रजिस्टर में उनकी जन्म तिथि 2 जनवरी 1965 दर्ज हुई। उस दौर में, जब दलित समाज के लिए तालीम के
दरवाज़े लगभग बंद-से थे, लेखक के पिता का हाई स्कूल पास होना कोई मामूली बात
नहीं थी—यह उस पूरे तबके के लिए एक बड़ी फ़ख़्र की बात थी। लेकिन इस खुशी के साये
में भी दुश्वारियाँ कम न थीं। अभी लेखक घुटने के बल चलना और किलकना सीख ही रहे थे
कि एक ऐसा ख़ौफ़नाक वाकया पेश आया जिसने मौत को बिल्कुल करीब से दिखा दिया। घर के
नज़दीक से गुज़रती पइन के किनारे से अचानक एक नेवला झपटा और उसने मासूम बालक की
गर्दन में अपने तीखे दाँत गड़ा दिए। उस ख़ौफ़नाक मंज़र को देखकर माँ की ममता तड़प
उठी; अपनी जान और हाथों के ज़ख़्मी होने की परवाह किए बिना उन्होंने सीधे नेवले के
जबड़े में हाथ डाल दिए और मशक्कत करके अपने 'बेटा धन' को मौत के मुँह से खींच निकाला।
बचपन का यह सफ़र हादसों तक सीमित नहीं
रहा था, कुदरत की मार और
बीमारियों की परेशानियों से भी भरा हुआ था। सन् 1967 का वह भीषण अकाल गाँव वालों के
ज़ेहन में एक खौफ़नाक याद बनकर दर्ज हो गया। बारिश रूठ चुकी थी, कुएँ सूखकर मटमैले हो गए थे और हर तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। इंसानों से
ज़्यादा मवेशियों की लाचारी देखने लायक थी; जब खेतों में घास का एक तिनका न
बचा, तो लोग बरगद, पीपल और ताड़ के पत्ते काट-काटकर मवेशियों के आगे
फेंकने लगे—पेड़ ठूंठ हो गए, लेकिन ज़िंदगी बचाने की जद्दोजहद
चलती रही। इसी अकाल के दौरान अमेरिकी सहायता योजना के तहत प्राइमरी स्कूल में
दलिया और दूध बाँटने का काम शुरू हुआ, जहाँ लेखक भी अपने भाई के साथ
छिपनी लेकर लाइन में खड़े होते थे। यहीं पर मासूम आँखों ने देखा कि राशन के
पैकेटों में स्थानीय स्तर पर कैसे 'लूट' का खेल खेला जाता है और राहत के
नाम पर आई चीज़ें गायब कर दी जाती हैं।
दूसरी तरफ़, सेहत के मोर्चे पर भी बचपन बेहद
नाज़ुक रहा। लेखक को निमोनिया का ऐसा दंश मिला जो हर महीने-दो महीने पर उन्हें
अपनी गिरफ़्त में ले लेता था; छाती धौंकनी की तरह चलने लगती और
साँसें उखड़ने लगतीं। माँ कभी केरोसिन और सरसों का तेल मिलाकर मालिश करती तो कभी
तरह-तरह के टोटके और दुआएँ-दवाएँ आज़मातीं। इसके अलावा, सोए में पेशाब कर देने की आदत ‘जिसकी वजह से गाँव के हमउम्र लड़के चिढ़ाकर 'खटमुतना' कहते थे’ ने अलग फ़जीहत कर रखी थी। हद तो तब हो गई जब गाँव में चेचक का भयानक
प्रकोप फैला, जिसने कई मासूम बच्चों की जानें ले लीं। लेखक भी इस
बीमारी की चपेट में आकर 'अब-तब' की नाज़ुक हालत में पहुँच गए थे। शाम ढलते ही बड़की चाची का नीम की पत्तियों
के साथ देवी-गीत गाना और पिता का नंगे पाँव देवी थान जाकर मन्नतें माँगना—यह सब उस
दौर के बेबसी का मिला-जुला मंज़र था। नौ दिनों की कशमकश के बाद जब जाके जान बची, तब कहीं जाकर लेखक मौत के मुँह से वापस लौट सके। इस तरह हादसों, अकाल और बीमारियों के साये में लेखक के बचपन का वह ढाँचा तैयार हुआ, जिसने उन्हें ज़ीने का हौसला और हालात से टकराने का हुनर सिखाया।
घर-परिवार जब तक एक रहता है, उसकी नींव मज़बूत दिखती है, लेकिन जैसे ही स्वार्थ और उकसावे
की हवा चलती है, बरसों का साझा आशियाना तिनके की तरह बिखरने लगता है।
लेखक के बचपन में भी एक ऐसा मोड़ आया, जब संयुक्त परिवार के सुकून पर
अलहदगी का ग्रहण लग गया। लेखक के पिता शीतल पासवान गाँव से बाहर नौकरी करते थे और
हर महीने एक निश्चित आय घर भेजते थे। यही बात परिवार के कुछ लोगों और बाहरी
शुभचिंतकों के पेट में दर्द पैदा करने लगी। लेखक के छोटे चाचा, पाँचु पासवान, दूसरों के उकसावे में आ गए। उन्हें लगने लगा कि बाहर
कमाने वाले भाई के पास पैसे की कोई कमी नहीं है, तो क्यों न आशियाने और ज़मीन-जायदाद
के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्से पर अपना कब्ज़ा जमा लिया जाए। इसी खिंचाव और रोज़-रोज़
की बहसबाज़ी के बाद अंततः परिवार के बंटवारे का टंटा खड़ा हो गया।
इस बंटवारे के दौरान जो छल-प्रपंच और बेईमानी हुई, उसने रिश्तों की बची-खुची मर्यादा भी तार-तार कर दी। परिवार में एक सौतेले
चाचा भी थे, जिन्हें सब 'महंथ जी' कहते थे। उनका विवाह नहीं हुआ था। पाँचु चाचा ने गाँव के कुछ प्रभावशाली लोगों
और पंचों से मिलीभगत करके, बेहद गुपचुप तरीके से महंथ जी के
हिस्से की पूरी ज़मीन अपनी पत्नी के नाम रजिस्ट्री करवा ली। जब औपचारिक बंटवारा हुआ, तो पंचों की तरफदारी के बल पर उन्होंने बना-बनाया पक्का मकान, बेहतर हिस्से और लहलहाती उपजाऊ ज़मीनें अपने नाम करवा लीं। दूसरी तरफ, लेखक के पिता के हिस्से में केवल मवेशी बाँधने वाली बदहाल, कच्ची कोठरियाँ, एक नाली-घर और कम उपजाऊ ज़मीन ही आई। एक तरह से चाचा
तीन हिस्सों के मालिक बन बैठे और लेखक के पिता को महज़ एक हिस्सा मिला।
जब लेखक का परिवार मवेशी बाँधने वाली उस पुरानी कोठरी
को साफ़ करने उतरा, तो ज़मीन से कीड़े निकल रहे थे। माँ लगातार कोसती और
रोती-बिलखती रहीं, लेकिन इस नाइंसाफ़ी और हड़प नीति के बावजूद लेखक के
पिता ने संयम और धैर्य का दामन नहीं छोड़ा। वे जानते थे कि कोर्ट-कचहरी और झगड़े में
उलझने से बच्चों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। उन्होंने किसी कानूनी लड़ाई या हिंसा
की बजाय खामोशी से अपने हिस्से को स्वीकार किया और अपना पूरा ध्यान बच्चों की
परवरिश, उनकी बेहतर तालीम और भविष्य को सँवारने पर केंद्रित
कर दिया। इस तरह, अपनों के ही छल और बेईमानी के बीच लेखक के परिवार ने
अपने स्वाभिमान और नई शुरुआत का ढाँचा तैयार किया।
शिक्षा और समाज में बराबरी की तमाम बड़ी-बड़ी बातों
के बीच जातिगत ऊँच-नीच का दंश किस कदर एक मासूम ज़ेहन को छलनी करता है, इसकी जीती-जागती तस्वीर लेखक के शुरुआती अनुभवों में नज़र आती है। सामाजिक
भेदभाव का पहला करारा झटका लेखक को बचपन में देवी थान पर आयोजित अखंड कीर्तन के
दौरान लगा। पूरे गाँव से चंदा जुटाकर चौबीस घंटे का 'हरे राम... हरे कृष्ण' कीर्तन रखा गया था। लेखक के घर से भी उनकी क्षमता से ज़्यादा चंदा लिया गया
था। लेकिन जब भक्ति के उस माहौल में लेखक अपने भाई के साथ उत्सुकतावश चबूतरे के
पास खड़े हुए, तो रघुनाथ महतो नामक व्यक्ति ने दोनों भाइयों का हाथ
पकड़कर धकियाते हुए भीड़ से अलग कर दिया। हद तो तब हो गई जब लेखक का दोस्त विजय जो
यादव जाति से था उनका हाथ पकड़कर कीर्तन में गोल-गोल घूमने वालों के साथ ले गया।
अभी लेखक ने एक चक्कर पूरा ही किया था कि रघुनाथ महतो ने उन्हें हाथ उठाकर धमकाया
और अपमानित करके बाहर निकाल दिया। मासूम मन यह समझ ही नहीं पाया कि चंदा लेने में
कोई छुआछूत नहीं थी, तो ईश्वर के नाम पर बने मण्डप में शामिल होने पर यह
अपमान क्यों?
गाँव के सामाजिक ढर्रे में जातीय छुआछूत और अपमान रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा
बनी हुई थी। शादी-ब्याह या किसी अन्य सार्वजनिक भोज-भांत के अवसरों पर जब दलितों
को खाने का बुलावा आता, तो उन्हें बराबरी का दर्जा देना तो दूर, घर के आंगन या साफ़ जगह पर भी बिठाना गवारा न था। दलितों को मवेशी बाँधने की
जगह को साफ़-सुथरा करके सबसे अंत में बिठाया जाता था। इतना ही नहीं, खाना खाने के बाद उनसे जूठे पत्तल उठवाना भी एक तय परंपरा की तरह थोप दिया गया
था। जातीय श्रेष्ठता का यह घमंड इतना गहरा था कि कोइरी बिरादरी की औरतें जब भी
लेखक के घर के सामने से गुज़रतीं, तो अपनी साड़ी को टखने तक ऐसे समेट
कर उठा लेती थीं मानो दलित के दरवाज़े पर कोई गंद या अशुद्धि फैली हो।
यह सामाजिक नफ़रत और छुआछूत गाँव की गलियों या
धार्मिक आयोजनों तक सीमित न होकर ज्ञान के मंदिर यानी स्कूलों में भी अपनी जड़ें
जमाए हुए थी। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक 'नयका गुरूजी' —रामस्वरूप शर्मा, जो भूमिहार जाति से थे— का रवैया लेखक और उनके भाई के प्रति हमेशा तल्ख़ और
हिंसक रहता था। वे बिना किसी कसूर के दोनों भाइयों की पीठ पर छड़ियाँ बरसाते थे।
यही सिलसिला हाई स्कूल पहुँचा, जहाँ गणित के शिक्षक सुरेश सिंह ने
एक मामूली सवाल का जवाब न दे पाने पर लेखक की तलहथियाँ सुन्न हो जाने तक खजूर की
छड़ी से बेरहमी से पिटाई की। उसी कक्षा में दूसरे सवर्ण छात्रों द्वारा उत्तर न
दिए जाने पर उन्हें छोड़ दिया जाता था, लेकिन लेखक का क्रम पहला होने और
दलित पृष्ठभूमि से आने के कारण वे हमेशा शिक्षकों के गुस्से और पूर्वाग्रह का आसान
निशाना बनते रहे। इन तमाम कड़वे अनुभवों ने लेखक को बचपन में ही यह अहसास करा दिया
कि पढ़े-लिखे होने के बावजूद समाज का एक तबका जाति के चश्मे से ही उन्हें देखने और
नीचा दिखाने पर आमादा था।
जाति और अभावों के सामाजिक दंश के बीच शिक्षा ही एक
ऐसा जरिया बनकर उभरी, जिसने लेखक के भीतर आत्मबल और नई दिशा का संचार किया।
लेखक की शुरुआती तालीम गाँव के ही खपरैल वाले कच्ची जमीन वाले प्राइमरी स्कूल से
शुरू हुई। वहाँ पढ़ाई के साथ-साथ 'नयका गुरूजी' का खौफ भी था। इसके बाद कक्षा चार से सात तक की पढ़ाई गाँव से लगभग साढ़े तीन
किलोमीटर दूर खिजरसराय मिडिल स्कूल में हुई। फिर यशवंत हाई स्कूल में दाखिला हुआ।
शुरुआत में संकोच और डर के कारण लेखक हमेशा कक्षा में सबसे पिछली बेंच पर बैठने के
आदी थे। इसके बावजूद अपनी लगन, मेधा और सुंदर लिखावट के बल पर वे
कक्षा में हमेशा अव्वल या दूसरे स्थान पर आते रहे। जब कक्षा सात या आठ का परिणाम
घोषित होता और एक दलित छात्र का नाम पहले या दूसरे नंबर पर गूँजता, तो पूरे गाँव और टोले में एक हैरत भरा कौतूहल फैल जाता था।
बचपन और किशोरावस्था के इस सफर में लेखक को सबसे बड़ा
ढांढस और संबल अपने दोस्त विजय कुमार से मिला। यादव टोले से आने वाला विजय एक
समृद्ध और दबंग परिवार का लड़का था। लेकिन लेखक के साथ उसकी दोस्ती हर जातीय
पूर्वाग्रह और सामाजिक ऊँच-नीच के दायरे से परे थी। स्कूल आने-जाने से लेकर
खेलने-कूदने और सुख-दुख साझा करने तक, विजय साये की तरह लेखक के साथ खड़ा
रहता। जब कभी गाँव में जातीय भेदभाव या उदंडता की स्थिति बनती, तो विजय का साथ लेखक के लिए एक ढाल बन जाता था। दोनों के बीच का यह अटूट
रिश्ता बचपन का खेल-कूद ssए आगे बढ़कर, दो
अलग-अलग बिरादरियों के बीच मानवीय जुड़ाव की एक मिसाल भी था।
इसी दौरान लेखक के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने
उनकी चेतना को गढ़ने का काम किया—वह था किताबों और साहित्य का चस्का। घर पर पिता
मुजफ्फरपुर और पटना से आते समय धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माया, सत्य कथा और सारिका जैसी चर्चित पत्रिकाएँ
लाया करते थे। पिता का मानना था कि "पढ़ोगे, तभी तो लिखोगे"। लेखक इन
पत्रिकाओं को चाव से पढ़ते और आकाशवाणी पर फ़िल्मी गानों के साथ-साथ देवकीनंदन
पांडेय और रामानंद सिंह के समाचार बड़े ध्यान से सुनते। साहित्यिक संस्कारों की यह
कली तब और विकसित हुई जब वे स्थानीय शिक्षक और लेखक खुर्शीद आलम 'आँसू' के संपर्क में आए। खुर्शीद आलम जी के यहाँ ट्यूशन पढ़ते समय लेखक उनकी लिखी
कहानियों और नाटकों की पांडुलिपियों की नकल करते और सारिका पत्रिका के पन्ने पलटते।
यहीं से पढ़ने की ऐसी ललक जागी कि आठवीं-नौवीं कक्षा
तक पहुँचते-पहुँचते पाठ्यक्रम की किताबों से इतर उपन्यासों की दुनिया से उनका गहरा
रिश्ता जुड़ गया। भाई की ससुराल जाने पर उन्हें किताबों का जखीरा मिला, जहाँ से वे झोले में भरकर उपन्यास अपने साथ ले आए। प्रेमचंद के यथार्थवादी
लेखन से लेकर कुशवाहा कांत, ओमप्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत, गुलशन नंदा और प्रेम बाजपेयी के चर्चित उपन्यासों को
वे घंटों एकांत में बैठकर पढ़ते रहते थे। पढ़ने का यह जुनून इस हद तक बढ़ गया था
कि धूप हो या सर्दी, खेतों के किनारे या श्मशान घाट के सन्नाटे में भी
लेखक हाथ में किताब लिए खोए रहते थे। इस साहित्यिक भूख और पठन-पाठन के संस्कार ने
ही आगे चलकर उनके भीतर के रचनाकार को गढ़ा और जीवन को एक नई वैचारिक दृष्टि दी।
जीवन का यह दौर केवल व्यक्तिगत अनुभवों से आगे बढ़ते
हुए कुदरत के कहर, देश की उथल-पुथल भरी राजनीति और समाज में रचे-बसे
अंधविश्वास के साथ-साथ परिवार की प्रगति का एक मिला-जुला अध्याय भी शामिल था। सन् 1975 की बात है, जब फल्गु नदी में एक प्रलयंकारी
बाढ़ आई। लगातार बारिश से नदी की लहरें विकराल रूप धारण कर चुकी थीं और पइन का
पानी गाँव के रास्तों और सड़कों पर तीन-तीन फीट तक चढ़ आया था। मिट्टी के कई कच्चे
मकान ज़मींदोज़ हो गए और चारों तरफ़ तबाही का मंज़र छा गया। ऐसे संकट के समय लेखक
के पिता का नया बना ईंट-खपरैल का घर गाँव के बेघर लोगों और रिश्तेदारों के लिए एक
सुरक्षित पनाहगाह बन गया। रामजी मिस्त्री का परिवार और लेखक के बुआ-फूफाजी का
परिवार अपने बचे-कुचे सामान के साथ लेखक के घर में आ ठहरे। इसी बाढ़ के दौरान एक
सुबह लेखक गढ़वा घाट पर नदी में उतर गए और तेज बहाव की चपेट में आकर डूबने लगे; वह तो भीम चौधरी नामक एक अच्छे तैराक ने सही समय पर उन्हें बाहर निकाला, वरना लेखक अपने जीवन की इस दूसरी जानलेवा घटना में समा गए होते।
इसी दौर में देश 1975 के इमरजेंसी के दौर से गुज़र रहा
था, जिसकी प्रतिध्वनि गाँव और कस्बों तक साफ सुनाई दे रही थी। ट्रकों-बसों पर लिखे
नारे "अनुशासन देश को महान बनाता है" बच्चों की कॉपियों तक पहुँच चुके
थे, तो दूसरी तरफ नसबंदी का एक भयानक ख़ौफ़ लोगों के दिलों में बैठ गया था। ट्रेन
यात्रियों से लेकर छोटे-छोटे बच्चों तक को पकड़कर नसबंदी किए जाने की अफ़वाहों ने
गाँव वालों को डरा दिया था। इसी दौरान जब लेखक अपने पिता के पास पटना गए, तो उन्होंने मंगल तालाब के मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विशाल जनसभा देखी। मंच से एक
खद्दरधारी जन-कवि द्वारा पढ़ी गई बेबाक पंक्तियाँ—"इन्दिरा जी... इन्दिरा जी, क्या हुआ आपको, सत्ता के मद में भूल गए बाप को..."—बालक के ज़ेहन में
हमेशा के लिए उतर गईं।
दूसरी तरफ, गाँव का सामाजिक वातावरण
अंधविश्वास और ओझा-गुनी के जाल में उलझा हुआ था। लेखक के छोटे चाचा पर अचानक
तथाकथित 'भूत' का प्रकोप होने लगा था, जिससे निपटने के लिए तरह-तरह के ओझा बुलाए गए। ओझाओं ने दावा किया कि यह 'भूत' चाची के नइहर के 'डाक बाबा' हैं, जो उनके साथ चले आए हैं। अंततः
इसका निदान यह निकाला गया कि सड़क के किनारे महुए के पेड़ के नीचे 'डाक बाबा' की एक पिंडी स्थापित कर दी गई। धीरे-धीरे यह पिंडी चाचा के लिए न होकर गाँव की
औरतों और टोले वालों के लिए धूप-अगरबत्ती, सिंदूर, शराब और बकरे की बलि चढ़ाने का एक नया केंद्र बन गई।
इन तमाम सामाजिक और प्राकृतिक विषमताओं के बीच लेखक
का घर प्रगति के नए कीर्तिमान भी स्थापित कर रहा था। लेखक के पिता की दूरदर्शिता
और माँ के दृढ़ संकल्प का ही नतीजा था कि नब्बे फीट गहरी बोरिंग कराकर गाँव में
दूसरा चापाकल लेखक के ही आँगन में गड़वाया गया। जो कोइरी औरतें दलितों से छुआछूत
मानती थीं, वे भी चापाकल के मीठे पानी और दाल गलाने के लिए लेखक
के घर आने लगीं। इतना ही नहीं, खुले में शौच जाने की फजीहत से
बचने के लिए लेखक के पिता ने गाँव में पहला 'सेफ्टी टैंक' वाला शौचालय भी अपने घर में बनवाया। इसके अलावा, घर में 'फिलिप्स' का रेडियो आया, जिसने शाम के समय 'चौपाल' और प्रादेशिक समाचार सुनने के लिए पूरे टोले के लोगों की चौपाल लेखक के
दरवाज़े पर जमा कर दी। इस प्रकार, एक तरफ जहाँ समाज पुरानी रूढ़ियों
और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा था, वहीं लेखक का परिवार आधुनिकता, शिक्षा और सुविधाओं की ओर अपने कदम मजबूती से बढ़ा रहा था।
विपिन बिहारी की आत्मकथा 'फल्गु के किनारे' एक व्यक्ति के
जीवन-सफर का लेखा-जोखा न होकर समकालीन समाज, साहित्य और मानवीय चेतना के धरातल पर प्रासंगिक एवं
विचारणीय कृति है। आज के दौर में, जब सामाजिक समरसता और समावेशी समाज के निर्माण पर निरंतर बल
दिया जा रहा है, यह आत्मकथा उन अदृश्य सामाजिक सच्चाइयों और सूक्ष्म रूप से मौजूद जातीय
पूर्वाग्रहों को उजागर करती है, जो आधुनिकता और विकास के आवरण के पीछे समाज में बने हुए
हैं। लेखक ने बिना किसी कुंठा या अतिरंजना के अत्यंत सहज, पारदर्शी और
प्रवाहमय शैली में अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा किया है, जो 'व्यष्टि से समष्टि' की यात्रा को सिद्ध
करता है—अर्थात एक दलित बालक के निजी संघर्ष और अपमान की कहानियाँ पूरे शोषित समाज
की प्रामाणिक आवाज़ बन जाती हैं। यह कृति इस मायने
में विशेष रूप से प्रासंगिक है कि यह स्थापित पूर्वाग्रहों को तोड़ती है। एक ओर
जहाँ यह समाज में मौजूद छुआछूत, शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव और जातीय श्रेष्ठता के घमंड
जैसी कटु सच्चाइयों को बेबाकी से सामने लाती है, वहीं दूसरी ओर यह सकारात्मकता और आत्मनिर्भरता का मार्ग भी
दिखाती है। पिता की दूरदर्शिता और शिक्षा के प्रति समर्पण के माध्यम से यह संदेश
मिलता है कि शिक्षा ही वह सशक्त माध्यम है जो विषमताओं से टकराने और आत्मसम्मान के
साथ जीने की शक्ति देती है। इसके अलावा, आत्मकथा में अकाल,
1975 की भीषण बाढ़, आपातकाल का खौफ और सामाजिक अंधविश्वास जैसे ऐतिहासिक व सामाजिक घटनाक्रमों
का जीवंत चित्रण है, जो इसे एक साहित्यिक रचना न बनाकर अपने समय का एक महत्त्वपूर्ण
सामाजिक-ऐतिहासिक प्रमाण बनाता है।
दलित आत्मकथा साहित्य के व्यापक परिदृश्य में 'फल्गु के किनारे' अपना एक अनूठा और विशिष्ट स्थान बनाती है। जहाँ ओमप्रकाश
वाल्मीकि की 'जूठन' या तुलसीराम की 'मुर्दहिया' जैसे ग्रंथों में सवर्ण समाज के सीधे उत्पीड़न और सामाजिक संघर्ष का उभार
दिखता है, वहीं विपिन बिहारी की यह आत्मकथा सवर्णों की अनुपस्थिति के बावजूद ग्रामीण
समाज की आंतरिक परतबंदी को सामने लाती है। यह पुस्तक सवर्ण बनाम दलित के पार
पारंपरिक ढांचे से आगे बढ़कर, समाज के अन्य अपेक्षाकृत सशक्त पिछड़े तबकों द्वारा दलितों
के प्रति अपनाए जाने वाले छुआछूत और भेदभाव का बेबाक सच सामने रखती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें