चौखटों पर सवाल बनती चम्पा

डॉ. अजय चौधरी

एसोसियट प्रोफेसर

8981031969

ajaychoudharyac@gmail.com

 

वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में जब सत्ता, व्यवस्था और संस्थागत दमन के सम्मुख नेहा बोरा, क्रैसि घोष जैसी मुखर, जुझारू और निर्भीक स्त्रियों के प्रचंड प्रतिरोध का तेवर उभरकर सामने आता है, तो अनायास यह प्रतीति होती है कि कात्यायनी की ‘चम्पा’ अब किसी बंद चौखट या पारिवारिक चारदीवारी के संत्रास से निकलकर सीधे समय के राजनीतिक रणक्षेत्र में उतर आई है। कविता में रूपायित ‘सात भाई’ आज घर की देहरी पर पहरा देने वाले पारंपरिक पितृसत्तात्मक रक्षक होने के बजाय वे राज्य-मशीनरी, दमनकारी पुलिसिया तंत्र, वैचारिक रूढ़िवाद, कॉरपोरेट-सामंती गठजोड़ और चौबीसों घंटे सक्रिय डिजिटल सर्विलांस के वे आधुनिक पहरेदार बन चुके हैं जो किसी भी स्त्री की राजनीतिक मुखरता और स्वायत्तता को अपने वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। जब-जब ये स्त्रियाँ सत्ता के क्रूर कानूनों, जनविरोधी नीतियों और फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ सड़कों, विश्वविद्यालयों और चौराहों पर सीना तानकर खड़ी होती हैं, तो व्यवस्था उन पर ठीक वही हिंसक औजार आज़माती है जो चम्पा पर आज़माए गए थे। उन्हें राजद्रोह के मुकदमों, जेल की सलाखों, संस्थागत लांछनों और आईटी-सेल द्वारा रचे गए भद्दे चरित्र-हनन के “ओखल में धान की तरह कूटने” और मुख्यधारा से बहिष्कृत कर “कूड़े की तरह फेंक देने” का संगठित षड्यंत्र रचा जाता है।

किंतु चम्पा के इस नए राजनीतिक अवतार की असली ताकत उसकी उस अपराजेय जिजीविषा में है, जो हर दमन को अपने प्रतिरोध की नई ज़मीन बना लेती है। व्यवस्था जब इन आन्दोलनकारी स्त्रियों को लाठियों, पानी की बौछारों, यूएपीए जैसे काले कानूनों और मीडिया ट्रायल के सड़ांध भरे दलदल में “जलकुम्भी की तरह दबाने” की पुरजोर कोशिश करती है, तो वे चुप बैठने या भयभीत होकर घर लौट जाने के बजाय एक प्रखर ‘नीलकमल’ की तरह और अधिक तेजस्वी बनकर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में खिल उठती हैं। वे पाखंडी विमर्श को भी तार-तार कर देती हैं जो स्त्री को संसद और भाषणों में ‘देवी’ और ‘सुरक्षित रखी जाने वाली वस्तु’ बनाकर मंचों पर पूजता है, किंतु अपने राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की मांग करने वाली स्त्री को बेरहमी से मसलने के लिए तत्पर रहता है। जब सत्ता यह मानकर आश्वस्त हो जाती है कि उसने लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और कानूनी घेराबंदी से एक आवाज़ को हमेशा के लिए कुचल दिया है, तभी उनकी यह लड़ाई एक व्यक्ति की सीमा को लांघकर पूरे समाज की साझा चेतना में तब्दील हो जाती है—ठीक उसी तरह जैसे झमाझम बारिश के बाद चम्पा की राख गाँव के “हर दरवाज़े के बाहर” उग आई थी।

इस समकालीन राजनीतिक संघर्ष का सबसे मारक और निर्णायक मुकाम वही है जिसे कात्यायनी “नागफनी के बीहड़ घेरों के बीच निर्भय-निस्संग चम्पा का मुस्कुराना” कहती हैं। आज सत्ता का ताना-बाना, नफरत का वातावरण, संस्थागत पूर्वाग्रह और काँटेदार पुलिसिया बैरिकेड्स ही वे आधुनिक 'नागफनी के बीहड़ घेरे' हैं, जिनके बीच खड़े होकर ये लड़कियाँ किसी रियायत, दया या पुरुषवादी संरक्षण की भीख नहीं माँगतीं। उनकी आँखों में तैरती वह ‘निर्भयता’ मृत्यु और कारागार के भय से पूर्ण मुक्ति की घोषणा है, और उनकी ‘निस्संगता’ उन तमाम पितृसत्तात्मक, दलीय और सामाजिक बंधनों का त्याग है जो स्त्री को समझौतों की ओर धकेलते हैं। वाटर कैनन और बूटों की आवाज़ों के सामने उनका सिर उठाकर मुस्कुराना सत्ता के समूचे अहंकार, उसकी बंदूकों और उसके झूठे न्याय-तंत्र पर किया गया सबसे तीखा ऐतिहासिक प्रहार है। नेहा बोरा और क्रैसि घोष जैसी स्त्रियों का यह निर्द्वंद्व संघर्ष सिद्ध करता है कि चम्पा अब घरेलू यातनाओं का प्रतिकार करने वाली प्रतीक न होकर वह राज्य और समाज के हर बंद, तानाशाही दरवाज़े के बाहर न्याय, बराबरी और जनवादी मुक्ति का अनिवार्य सवाल बनकर स्थाई रूप से खड़ी हो चुकी है—एक ऐसी उपस्थिति जिसे न कोई जेल रोक सकती है, न कोई लाठी दबा सकती है और न ही कोई सत्ता पराजित कर सकती है।

कविता व्यवस्था के दमित अंतर्विरोधों, सत्ता-संरचनाओं और मानवीय संघर्षों से टकराने का एक प्रखर औजार है। समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-विमर्श जब लोक, परंपरा और आधुनिकता के त्रिकोण पर खड़ा होकर संवाद करता है, तो वह सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक संस्थाओं की जड़ों को हिला देने वाला एक विद्रोही का घोषणापत्र बन जाता है। कात्यायनी की बहुचर्चित कविता ‘सात भाइयों के बीच चम्पा’ इसी विद्रोही तेवर और संश्लिष्ट चेतना का ऐसा अद्वितीय पाठ है, जो लोककथाओं के रूमानी छद्म को तोड़कर समकालीन यथार्थ के सबसे खौफनाक और नग्न सच को उजागर करता है।

कात्यायनी की कविता ‘सात भाइयों के बीच चम्पा’ स्त्री के व्यक्तिगत संत्रास का आख्यान है, साथ ही सदियों पुरानी व्यवस्था की चीरफाड़ है जहाँ स्त्री की उपस्थिति को ही अपराध बना दिया जाता है। लोककथाओं में ‘सात भाइयों की अकेली लाडली बहन’ का जो भावुक और संरक्षणवादी ढाँचा गढ़ा गया था, कवयित्री ने उसे उलटकर पितृसत्ता के सबसे हिंसक यथार्थ को उजागर किया है। यहाँ ‘सात भाई’ रक्षात्मक कवच के रूप में न होकर उस सामंती चौकसी के सात क्रूर पहरेदारों के रूप में खड़े हैं, जिनकी निगाह में चम्पा का सयाना होना, उसकी देह की लचक और उसका स्वतंत्र अस्तित्व पिता की छाती पर लोटता हुआ साँप प्रतीत होता है। स्त्री का खिलना और उसकी दैहिक स्वायत्तता परिवार के तथाकथित ‘कुल-सम्मान’ के लिए एक दुःस्वप्न बन जाती है, जिसे नियंत्रित करने, कुचलने और अंततः मिटा देने के लिए पूरा तंत्र लामबंद हो जाता है।

दमन की इस प्रक्रिया को कवयित्री ने घरेलू श्रम और उत्पादन के रूपकों से जोड़कर मार्मिक ढंग से उद्घाटित किया है। चम्पा को “ओखल में धान के साथ कूट दिया जाना” स्त्री-श्रम के उस बर्बर वस्तुकरण का प्रतीक है, जहाँ उसकी पहचान को उसके उपयोगिता-मूल्य तक सीमित कर दिया जाता है। जब वह उपभोग के अयोग्य समझी जाती है, तो उसे “भूसी के साथ कूड़े पर फेंक दिया जाता है”—यह समाज द्वारा निरुपयोगी मानकर त्यागी गई स्त्री की नियति है। किंतु चम्पा की मूल शक्ति उसकी पराजय-विहीन जिजीविषा में है। वह कूड़े के ढेर पर नष्ट होने के बजाय 'अमरबेल' बनकर उग आती है। झरबेरी के सात कँटीले झाड़—जो भाइयों और समाज के सात कड़े पहरे हैं—उसे रोक नहीं पाते; वह उन काँटों के बीच भी सयानी होती है और पुनः उस घर की चौखट पर आ धमकती है जो उसे निष्कासित कर चुका था। यह लौटना पितृसत्ता के मुंह पर पहला करारा तमाचा है।

जब तिरस्कार से बात नहीं बनती, तो व्यवस्था नग्न और सांस्थानिक हिंसा पर उतर आती है। चम्पा का “घर की छत से लटकती पाई जाना” ऑनर किलिंग और हत्या को आत्महत्या का रूप देने के उस घिनौने सच की ओर इशारा करता है, जो आज भी समाज के अंधेरे कोनों में घटित होता है। कुल की तथाकथित मर्यादा को ढँकने के लिए उसे “तालाब में जलकुम्भी के जालों के बीच” दबा दिया जाता है—जलकुम्भी जो सड़न, ठहराव और सामाजिक पाखंड का संजाल है। किंतु चम्पा का विलोपन असंभव है; वह उस दलदल से ‘नीलकमल’ बनकर खिल उठती है। कीचड़ और ठहराव के बीच से नीलकमल का यह उद्भव सिद्ध करता है कि स्त्री-चेतना को बदनामी और कलंक के जालों में घोंटकर मारा नहीं जा सकता। वह गंदले सामाजिक सरोवरों से और अधिक दैदीप्यमान होकर ऊपर उठती है और निर्द्वंद्व भाव से फिर घर लौट आती है।

इसके उपरांत कविता धर्म, शुचिता और देवत्व के पाखंडी आवरण पर तीखा प्रहार करती है। व्यवस्था अब उसे “देवता पर चढ़ाती है”—अर्थात पवित्रता के अमूर्त खूँटे से बांधकर उसकी मानवीय स्वायत्तता को हड़प लेती है। किंतु जैसे ही वह मुरझाती है, उसे बेरहमी से मसलकर जला दिया जाता है। यह सतीत्व और पवित्रता की वह छलना है जो स्त्री को देवी बनाकर पूजती है और अंततः भस्म कर देती है। उसके अस्तित्व को जड़ से मिटाने के लिए उसकी राख को पूरे गाँव में बिखेर दिया जाता है, ताकि उसका कोई अंश शेष न रहे। किंतु यह कृत्य अनजाने में ही चम्पा की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर देता है। जिस राख को उसका अंत समझा गया था, वह रात की झमाझम बारिश के साथ समूची धरती में उर्वरता बनकर समा जाती है।

कविता का चरमोत्कर्ष स्त्री के वैयक्तिक संघर्ष को एक सर्वव्यापी, क्रांतिकारी सामाजिक चेतना में रूपांतरित कर देता है। चम्पा अब एक घर की छत से लटकने वाली असहाय देह की जगह अगली ही सुबह वह “हर दरवाज़े के बाहर” उपस्थित पाई जाती है। “नागफनी के बीहड़ घेरों के बीच” उसका यह अंकुरण दिखाता है कि विपरीत से विपरीत, बंजर और हिंसक परिवेश में भी वह अपने आत्मबल के साथ जीवित रहने की कला जानती है। सबसे विलक्षण है उसका “निर्भय-निस्संग मुस्कुराना।” यह मुस्कुराहट भय, मोह, संकोच और संबंधों के झूठे बंधनों से पूर्ण मुक्ति की घोषणा है। वह अब हर चौखट पर सवाल बनकर खड़ा वह अजेय प्रतिरोध है जिसे कोई ओखल, कोई फंदा, कोई दलदल और कोई आग कभी समाप्त नहीं कर सकती।

कात्यायनी की यह कविता समकालीन विमर्श को यह अनिवार्य अंतर्दृष्टि देती है कि स्त्री पर होने वाली हिंसा व्यक्तिगत न होकर संरचनात्मक है; और उसी प्रकार उसका समाधान भी संरक्षण की भीख में न मांग संस्थागत बंधनों को तोड़कर सार्वजनिक चौखटों पर सवाल बनकर खड़े होने में है। जब तक समाज में चम्पा को दबाने वाले 'सात भाई' मौजूद हैं, तब तक हर बंद दरवाज़े के बाहर नागफनी को चीरती हुई चम्पा की यह निर्भीक मुस्कुराहट सत्ता के हर पहरे को बेचैन करती रहेगी। यह कविता इक्कीसवीं सदी के समकालीन परिदृश्य में और भी अधिक प्रखर, असुविधाजनक और अनिवार्य सत्य बनकर सामने आती है। कविता में रूपायित ‘सात भाइयों की चौकसी’ आज परिवार, समाज, खाप पंचायतों, जातिवादी गोलबंदियों और डिजिटल ‘मोरल पुलिसिंग’ के उस बहुस्तरीय निगरानी-तंत्र का प्रतीक बन चुकी है जो स्त्री के सयाने होने, उसके स्वतंत्र चुनाव और उसकी दैहिक स्वायत्तता को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। आज जब हम अखबारों में अंतरजातीय या अपनी पसंद से प्रेम-विवाह करने वाली युवतियों की ‘ऑनर किलिंग’ की खबरें पढ़ते हैं—जहाँ सगे पिता और भाई ही अपनी बेटियों-बहनों की नृशंस हत्या कर उसे पंखे से लटकाकर ‘आत्महत्या’ की शक्ल दे देते हैं—तब चम्पा का “छत से लटकती पाई जाना” सीधे तौर पर हमारे समय के इस बर्बर यथार्थ को उजागर करता है। हाथरस कांड में रात के अंधेरे में बिना परिजनों की सहमति के पीड़िता का अंतिम संस्कार कर साक्ष्य मिटाने की प्रशासनिक हड़बड़ी हो, अंकिता भंडारी हत्याकांड में रिजॉर्ट पर रातों-रात बुलडोजर चलाकर सबूत नष्ट करने की कोशिश हो, या कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में महिला चिकित्सक के साथ हुई बर्बरता को पहले ‘आत्महत्या’ बताकर दबाने का सांस्थानिक प्रयास—ये सभी घटनाएँ चम्पा को “जलकुम्भी के सड़ांध भरे जालों में दबाने” और उसकी “राख पूरे गाँव में बिखेर देने” की आधुनिक तकनीकें ही हैं।

आर्थिक और सांस्कृतिक धरातल पर भी चम्पा का रूपक आज के नवउदारवादी दौर में बेहद सटीक बैठता है। “ओखल में धान के साथ कूट दी जाना और भूसी की तरह कूड़े पर फेंक दी जाना” आज के अनौपचारिक क्षेत्र और घरेलू चहारदीवारी के भीतर अवैतनिक श्रम में खटने वाली उन करोड़ों स्त्रियों की नियति है, जिनके श्रम से समूचे परिवार और समाज का पहिया घूमता है; किंतु जैसे ही वे बीमार, वृद्ध या अपनी स्वायत्तता की मांग करने वाली बनती हैं, उन्हें उपभोग की व्यवस्था से बाहर फेंक दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, “देवता पर चढ़ाया जाना और मुरझाने पर मसलकर फेंक दिया जाना” हमारे समाज के उस दोगले सांस्कृतिक पाखंड की नसों को काटता है जहाँ नवरात्रों में छोटी कन्याओं के पैर पूजे जाते हैं, भाषणों में ‘मातृशक्ति’ के कसीदे काढ़े जाते हैं, किंतु व्यावहारिक जीवन में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने से इनकार कर दिया जाता है और कार्यस्थलों से लेकर सड़कों तक स्त्री के बुनियादी मानवाधिकारों को कुचल दिया जाता है। उसे देवी बनाकर पूजना वास्तव में उसकी जीती-जागती मानवीय देह, उसकी इच्छाओं और उसकी स्वतंत्र आवाज़ को हड़प लेने की सबसे चालाक पितृसत्तात्मक साजिश है।

किंतु वर्तमान संदर्भ में इस कविता का सबसे ऊर्जावान और प्रासंगिक आयाम चम्पा के पुनर्जन्म और उसकी सामूहिक चेतना में निहित है। दमनकारी चाहे साक्ष्यों को राख बनाकर हवा में उड़ा दें, लेकिन वह राख नष्ट होने के बजाय चेतना की जमीन में खाद बनकर समा जाती है। कोलकाता की घटना के बाद आधी रात को सड़कों पर उतरी हजारों आम महिलाओं का ऐतिहासिक 'रिक्लेम द नाइट' आंदोलन हो, महिला पहलवानों विनेश फोगाट, साक्षी मलिक आदि द्वारा व्यवस्था के सबसे ताकतवर पुरुष-सिंडिकेट के खिलाफ जंतर-मंतर पर की गई बेखौफ जंग हो, या फिर वैश्विक स्तर पर ईरान में हिजाब की अनिवार्यता के खिलाफ अपने बाल काटकर सड़कों पर उतरी स्त्रियों का 'ज़ैन, ज़िंदगी, आज़ादी' का नारा—ये सभी प्रतिरोध उस बिखेरी गई राख से उपजी चम्पा का ही साक्षात रूप हैं। चम्पा अब किसी एक घर की पीड़िता न होकर वह हर दरवाजे, हर चौराहे और हर संसद के बाहर न्याय का सवाल बनकर उपस्थित हो चुकी है।

अंततः, “नागफनी के बीहड़ घेरों के बीच निर्भय-निस्संग चम्पा का मुस्कुराना” आज की आधुनिक, शिक्षित और मुखर स्त्री के उस स्वाभिमानी तेवर का घोषणापत्र है जो अब किसी दया, संरक्षण या रियायत की भीख नहीं मांगती। नागफनी आज की ट्रोल आर्मी, साइबर बुलिंग, चरित्र-हनन और कानूनी-सामाजिक रुकावटों का वह जहरीला जंगल है, जिसके बीच डटकर आज की स्त्री अपनी मुस्कुराहट से सदियों पुरानी पितृसत्ता को चुनौती दे रही है। यह मुस्कान पूरी व्यवस्था पर एक निर्मम व्यंग्य है जिसने समझा था कि स्त्री को ओखल में कूटकर, फंदे पर टांगकर या आग में जलाकर समाप्त किया जा सकता है। कात्यायनी की यह कविता आज साबित करती है कि स्त्री की मुक्ति किसी भाई के संरक्षण या पिता की मर्यादा में न होकर अपने ही विनाश की राख से बार-बार उठकर हर बंद चौखट के बाहर निर्भय होकर मुस्कुराने में है।

 


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