हमारा समाज कैसा हो?
हमारा समाज कैसा हो?
डॉ. अजय चौधरी
एसोसियट प्रोफेसर
8981031969
मानव सभ्यता और राष्ट्र के विकास का सबसे
बुनियादी प्रश्न यह होता है कि उसकी समाज व्यवस्था का आधार क्या है। व्यापक धरातल
पर देखें तो व्यवस्था के दो रूप प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं—एक प्रकृति-प्रदत्त और
दूसरा मानव-निर्मित। प्रकृति ने मनुष्य को एक जैसी शारीरिक बनावट, एक जैसा
लाल रक्त और एकसमान बुनियादी जरूरतें देकर इस धरती पर भेजा था; उसने इंसानों के बीच सीमाएं, जातियां या मजहब नहीं
गढ़े थे। लेकिन कालांतर में इंसान ने अपने मानसिक विकास के एक खास पड़ाव पर जिस मानव-निर्मित
व्यवस्था को जन्म दिया, उसका आधार उसने धर्म, ईश्वर और पारलौकिक आस्था को बना दिया। यह एक ऐसी विचित्र संरचना सिद्ध हुई,
जिसने पहले स्वयं ईश्वर की कल्पना की और फिर समाज की संपूर्ण रचना,
विकास और सुख-दुख का सारा दारोमदार भी उसी अज्ञात, अलौकिक शक्ति के मत्थे मढ़ दिया।
आज भारतीय समाज इसी
धर्मप्रदत्त और पुरोहिती व्यवस्था की जकड़न में बुरी तरह फंसा हुआ नजर आता है।
इंसान को इस लोक की वास्तविक भूख, गरीबी, बीमारी,
अन्याय और सामाजिक विषमता से भटकाकर स्वर्ग-नरक के काल्पनिक फेर में
उलझा दिया गया है। जब इस धार्मिक जड़ता और शोषण से मुक्ति के लिए पश्चिम में
धर्मनिरपेक्षता का आधुनिक विचार उपजा, तो उसका एकमात्र
लक्ष्य था—धर्म के शिकंजे को तोड़कर मनुष्य, उसकी गरिमा और
मानवीय अधिकारों को सर्वोच्च स्थान देना। इस मानवतावादी दर्शन को विकसित करने और
रूढ़िवादी चर्च की सत्ता को चुनौती देने के लिए कई विचारकों व समाज-सुधारकों को
सामाजिक बहिष्कार और उम्रकैद की कठोर यातनाएं तक झेलनी पड़ीं। किंतु विडंबना देखिए
कि जब धर्मनिरपेक्षता का यह क्रांतिकारी विचार भारत की धरती पर आया, तो यहाँ की चुनावी राजनीति और अवसरवाद ने इसे सर्वधर्म समभाव की चौखट पर
लाकर सीमित कर दिया। सभी मजहबों को समान रूप से गले लगाने की इस कवायद ने
धर्मान्धता को समाप्त करने के बजाय उसे नए सिरे से खाद-पानी दिया और समाज में
अंतर्निहित साम्प्रदायिक खाई को और चौड़ा कर दिया। भारतभूमि की वास्तविक सुंदरता
और शक्ति यहाँ की बहुलतावादी, बहुरंगी और साझा संस्कृति में
रही है—जहाँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख,
ईसाई, पारसी, बौद्ध और
जैन सदियों से एक-दूसरे के ताने-बाने में रच-बसकर इस मुल्क को पल्लवित-पुष्पित
करते आए हैं।
अब इक्कीसवीं सदी के इस
निर्णायक मोड़ पर हमें यह तय करना होगा कि भावी भारत के निर्माण में कौन-सी
व्यवस्था मानवोपयोगी सिद्ध होगी—मध्यकालीन धर्मान्धता, अन्ध-आस्था
और जातिगत खांचों पर टिकी सड़ी-गली व्यवस्था, या फिर तर्क,
विवेक, वैज्ञानिक चेतना और मानवीय समता पर
आधारित एक आधुनिक समाज व्यवस्था? गीतेश शर्मा की पुस्तक
“भारतीय संस्कृति और हिन्दुत्व” इस देश की ऐतिहासिक व सामाजिक यथार्थ के आलोक में
इसी द्वंद्व की पड़ताल करता है और यह रेखांकित करता है कि भारत का भविष्य मजहबी
संकीर्णताओं के संरक्षण में न होकर मानवता और वैज्ञानिक दृष्टि की निर्भीक
पुनर्स्थापना में ही निहित है।
अगर हम इतिहास और समाज
के विकासक्रम को खुली आँखों से देखें, तो यह बात शीशे की तरह साफ़ हो जाती है कि
किसी अलौकिक सत्ता ने इंसान को नहीं रचा, खुद इंसान ने अपने बौद्धिक विकास के एक
खास मोड़ पर धर्म और ईश्वर की अवधारणा को गढ़ा था। सुदूर जंगलों और द्वीपों में
रहने वाले आदिवासियों की सहज जीवन-शैली इसका अकाट्य साक्ष्य है, जिनका जीवन किसी संगठित धर्म, मन्दिर-मस्जिद या
शास्त्रीय कर्मकांड के बिना भी प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर सदियों से मजे में
चलता आ रहा है। समाज के संचालन में धर्म और ईश्वर को सर्वेसर्वा मान लेना ही दरअसल
मानवीय प्रगति के पहिए में लगा सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुआ है।
महापंडित राहुल
सांकृत्यायन ने जब अपनी तीखी तार्किक शैली में इस पर कलम चलाई, तो
उन्होंने साफ़ कहा कि “ईश्वर कुछ और नहीं, बल्कि इंसान के
अज्ञान, उसकी लाचारी और प्रकृति के अज्ञात थपेड़ों के सामने
उसकी बेबसी का ही एक सम्भ्रांत नाम है।” समाजशास्त्रीय नज़रिए से देखें तो यह कोई
मासूम आस्था भर नहीं थी; समाज के चतुर, धूर्त और वर्चस्वशाली तबके ने इस अज्ञान को संस्थागत रूप देकर अपने
स्वार्थों की ढाल बना लिया। धर्म ने इंसान को यह पट्टी पढ़ा दी कि तुम्हारी ग़रीबी,
लाचारी और दुख पिछले जन्म के कर्मों का फल हैं और नियंता की मर्जी
के बिना पत्ता तक नहीं खड़कता। इसका नतीजा यह हुआ कि जीता-जागता इंसान अपने
बुनियादी हकों के लिए लड़ने की बजाय परजीवी, भाग्यवादी और
अकर्मण्य बनकर रह गया। उसे इस लोक की भूख, बीमारी, शोषण और नाइंसाफी से भटकाकर परलोक के काल्पनिक सुखों और दोजख के खौफ़ में
ऐसा उलझाया गया कि वह अपनी ही बेड़ियों की पूजा करने लगा।
दर्शन की भाषा में कहें
तो जब तक समाज का चिंतन इहलोकवादी न होकर पारलौकिक बना रहेगा, तब तक
वास्तविक सामाजिक न्याय और समता की बात बेमानी है। अगर भारत को सचमुच एक आधुनिक,
गतिशील और न्यायसंगत समाज बनाना है, तो हमें
व्यवस्था के केंद्र से धर्म और ईश्वर की इस कृत्रिम धुरी को हटाकर उसे हाशिए पर
धकेलना ही होगा। समाज का आधार काल्पनिक परलोक या धार्मिक संहिताएँ न होकर हाड़-मांस
का जीता-जागता मनुष्य और उसकी गरिमा होनी चाहिए। जब मानवता, वैज्ञानिक
दृष्टि और वास्तविक मानवीय सरोकार हमारी प्राथमिकताओं के केंद्र में होंगे,
तभी यह मुल्क रूढ़ियों की सड़ांध से निकलकर एक स्वस्थ और समतामूलक
समाज की खुली हवा में सांस ले सकेगा।
आधुनिक राजनीति और समाज
के विमर्श में धर्मनिरपेक्षता
एक
ऐसा विचार रहा है जिसकी जितनी दुर्गति भारत में हुई, शायद ही कहीं और हुई हो। यूरोप के पुनर्जागरण और टॉमस पाइन
जैसे विचारकों के संघर्ष से उपजा सेक्युलरिज्म राज्य और समाज को चर्च के रूढ़िवादी
शिकंजे से पूरी तरह आज़ाद कर मानवीय गरिमा को केंद्र में रखने का फलसफा था। लेकिन
भारतीय राजनीति के अखाड़े में उतरते ही इस बुनियादी अवधारणा का चेहरा-मोहरा ही बदल
दिया गया। महात्मा गांधी ने जब सर्वधर्म समभाव को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया, तो अनजाने में ही सही, उन्होंने धर्म से मुक्ति के इस आधुनिक विचार
को धार्मिक चौखट में ही क़ैद कर दिया। हर धर्म का बुनियादी ढाँचा ही इस
अहसास-ए-कमतरी या अहसास-ए-बरतरी पर टिका होता है कि "मेरा रास्ता ही अंतिम
सत्य है और बाकी सब भटके हुए हैं"। जब मूल डीएनए में ही यह वर्चस्व की होड़
शामिल हो, तो तमाम धर्मों को एक
साथ गले लगाने की यह कवायद व्यावहारिक रूप से साम्प्रदायिक सद्भाव पैदा करने के
बजाय मजहबी कट्टरपंथ को नया खाद-पानी मुहैया कराने का जरिया बन गई। महापंडित राहुल
सांकृत्यायन ने इस पाखंड की नब्ज़ पकड़ते हुए दो-टूक लिखा था कि "हिन्दुस्तानियों की एकता
मजहबों के मेल पर नहीं, बल्कि मजहबों की
चिता पर होगी"—क्योंकि जब तक
मजहबी अस्मिताएँ जीवित रहेंगी, उनके बीच का
अंतर्निहित टकराव कभी न कभी शोला बनकर भड़केगा ही।
दशकों के चुनावी सफर में
यह तथाकथित सेक्युलरिज्म गिरते-गिरते महज़ वोट बैंक की जुगाड़, जातियों के दोहन और अवसरवादी तुष्टीकरण की
लफ़्फ़ाज़ी में तब्दील होकर रह गया। प्रगतिशील कहलाने वाले बौद्धिक हलकों में भी
एक अजीब किस्म का डबल थिंक
और
दोहरा रवैया घर कर गया—जहाँ बहुसंख्यक समाज की सड़ी-गली रूढ़ियों, देवी-देवताओं और अंधविश्वासों पर तो खुलकर
तार्किक प्रहार किए गए, लेकिन
अल्पसंख्यकों के कट्टरपंथ, पर्सनल लॉ की
मध्यकालीन विसंगतियों या मजहबी संकीर्णता पर आते ही कलम की धार कुंद पड़ गई। इस
आधे-अधूरे और लंगड़े रवैये ने ही असल में प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्ववादी राजनीति
को यह कहने का मुकम्मल मौका दिया कि यह धर्मनिरपेक्षता न होकर छद्म धर्मनिरपेक्षता है। जब आप एक वर्ग के
दकियानूसीपन को तो कोसते हैं और दूसरे वर्ग के अंधविश्वासों को प्रगतिशीलता की
पगड़ी पहनाते हैं, तो आप दरअसल
साम्प्रदायिकता से लड़ नहीं रहे होते, उसे और जहरीला
बना रहे होते हैं।
ऐसे में वक़्त की सबसे
बड़ी दरकार है कि हम इस पाखंडी समभाव के दायरे से बाहर निकलकर सच्ची धर्मनिरपेक्षता की ज़मीन तैयार करें।
वास्तविक धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों के पचड़ों में बराबर टांग अड़ाना या
उनके कर्मकांडों को राज्य की छत्रछाया देने के बजाय धर्म से पूर्णतः विरत और तटस्थ होना है। राज्य
और सार्वजनिक नीतियों का मजहब, मन्नत या मोक्ष
से रत्ती भर भी सरोकार नहीं होना चाहिए। नागरिक की पहचान किसी मन्दिर, मस्जिद या गुरुद्वारे की चौखट होने के बजाय उसके
मानवीय अधिकारों, गरिमा और
संविधान की समतामूलक धारा से तय होनी चाहिए। जब तक हम सार्वजनिक जीवन से मजहब के
इस भावनात्मक घालमेल को पूरी तरह ख़ारिज कर वैज्ञानिक सोच और तार्किकता को अपनी
राष्ट्रीय दिशा नहीं बनाते, तब तक एक सभ्य
और आधुनिक भारत की कल्पना महज एक मुगालता ही बनी रहेगी।
भारतीय समाज के ऐतिहासिक
यथार्थ को टटोलें, तो यह कड़वी
सच्चाई सामने आती है कि जन्मगत जाति-व्यवस्था किसी विदेशी आक्रांता या पश्चिमी
उपनिवेशवाद की देन न होकर पूरी तरह से देशज और धर्मप्रदत्त अभिशाप है। हमारे यहाँ
के दकियानूसी यह कुतर्क गढ़ते हैं कि वर्ण-व्यवस्था तो दरअसल गुण और कर्म के आधार पर बनी थी, लेकिन उनसे यह सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए कि
यदि यह कर्म पर आधारित थी, तो फिर सदियों
से जन्मजात क्यों बनी रही ? रोटी और बेटी का
रिश्ता जन्म के आधार पर ही क्यों तय होता रहा ? असल में, वैदिक काल के
उत्तरार्ध से लेकर पौराणिक युग तक पुरोहिती व्यवस्था ने इस विभाजन को धर्म और
ईश्वर की मुहर लगाकर ऐसा संस्थागत रूप दे दिया कि एक इंसान का सम्मान और उसकी
सामाजिक हैसियत उसके काम या योग्यता होने के बजाय बात से तय होने लगी कि वह किस
कोख से पैदा हुआ है। जैसे कर्ण के
साथ हुआ था। उसकी योग्यता को उसकी जाति और जन्म से जोड़कर भीष्म और द्रोणाचार्य ने
उसका मजाक बनाया था।
इस व्यवस्था की सबसे
भयानक विडम्बना यह रही कि इसने समाज को अनगिनत टुकड़ों और खांचों में बाँटकर उनके
बीच स्थायी ऊँच-नीच की खाई खोद दी। डॉ. आंबेडकर ने इसे श्रम का विभाजन के बजाय श्रमिकों
का विभाजन कहा था; और पुस्तक के तथ्य भी यही उजागर करता है कि
यह जातिगत विष-बेल हिन्दू समाज तक सीमित न रहकर उन धर्मों को भी अपनी गिरफ्त में
ले लिया जो सैद्धांतिक रूप से समानता का दावा करते थे। आज भारतीय उपमहाद्वीप के
मुसलमानों और ईसाइयों में भी अशराफ़-अजलाफ़,
अगड़े-पिछड़े
के रूप में वही जातिगत संकीर्णता और रोटी-बेटी के रिश्तों की वर्जनाएँ साफ़ देखी
जा सकती हैं। राजनीति ने इस घाव को भरने के बजाय अपने तात्कालिक चुनावी स्वार्थों
के लिए इसका भरपूर दोहन किया, जिसके चलते
आज़ादी के दशकों बाद भी नागरिक अपनी मानवीय पहचान छोड़कर जातीय गोलबंदियों में
क़ैद हैं।
इसलिए, यदि भारत को सचमुच एक सभ्य, आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र बनना है, तो केवल सतही सुधारों या आरक्षण की राजनीति
की जुगाड़ से काम नहीं चलने वाला। जब तक इस विष-वृक्ष की मूल जड़ यानी धर्मप्रदत्त
मान्यताओं और पवित्रता के पाखंड पर खुला,
तार्किक
प्रहार नहीं होगा, तब तक जाति का
समूल नाश संभव नहीं है। एक स्वस्थ समाज व्यवस्था की पहली शर्त यह है कि वह पूर्णतः वर्णहीन और जातिविहीन हो, जहाँ जन्म के आधार पर मिलने वाले
विशेषाधिकार या थोपी गई हीनता को पूरी तरह ध्वस्त किया जाए। अंतरजातीय और
अंतरधार्मिक विवाहों का स्वाभाविक चलन,
सामाजिक
समरसता और संवैधानिक समता तभी हक़ीक़त बन सकती है जब मनुष्य को किसी जातिगत पहचान
के चश्मे से देखने के बजाय एक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण नागरिक के रूप में देखा जाए।
हमारे समाज में धर्म के
नाम पर जिस तरह की अन्ध-आस्था और कर्मकांडीय तमाशे को संस्कृति का मुलम्मा पहनाकर परोसा
जाता है, वह सामाजिक और आर्थिक
रोग का लक्षण है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो धर्म और पूंजीवादी बाज़ारवाद
ने हाथ मिलाकर एक ऐसा विचित्र गठजोड़ तैयार कर लिया है जहाँ आस्था एक उपभोक्ता
सामग्री बनकर रह गई है।
आज देश के भीतर 24 लाख से अधिक
धर्मस्थल खड़े हैं, जबकि जीवन बचाने
वाले अस्पतालों और ज्ञान बांटने वाले स्कूलों-कॉलेजों की कुल संख्या महज़ 18 लाख के आसपास सिमट कर रह गई है। दुर्गापूजा, गणेशोत्सव या कांवड़ यात्राओं जैसे विशाल
धार्मिक आयोजनों पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपये और अपार मानवीय श्रम दिखावे, हुड़दंग और अश्लील प्रदर्शन की भट्ठी में
झोंक दिया जाता है। महीनों की मेहनत से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं गढ़ी जाती हैं
और फिर चंद दिनों के उन्माद के बाद उन्हें नदियों और तालाबों में विसर्जित कर
पर्यावरण का दम घोंट दिया जाता है। विडंबना देखिए कि जो समाज बुनियादी सफाई, शुद्ध पेयजल और दो वक्त की रोटी के लिए तरस
रहा हो, वही समाज वैतरणी पार
करने के नाम पर मरियल गाय का दान करने और पाखंडी पंडे-पुरोहितों को दक्षिणा खिलाकर
स्वर्ग की टिकट कटाने का मुगालता पाले बैठा है।
यह अन्धविश्वास अपराध, भ्रष्टाचार और अनैतिकता के साथ एक खतरनाक
सह-अस्तित्व कायम कर लिया है। जिस समाज में अपराधी डकैती डालने से पहले काली मंदिर
में मन्नत मांगते हों और भ्रष्ट नेता व उद्योगपति अपने काले धन के कारोबार में
ईश्वर को बाकायदा पार्टनर
बनाकर
चढ़ावा चढ़ाते हों, वहाँ धर्म
नैतिकता का स्रोत न होकर पाप धोने की सबसे सुलभ वाशिंग मशीन बन जाता है। मार्क्स
ने धर्म को यूं ही अफीम नहीं कहा था—यह अफीम इंसान के विवेक को सुला देती है और
उसे यथास्थिति के सामने घुटने टेकने पर मजबूर करती है। अगर भारत को सचमुच इक्कीसवीं
सदी का एक समर्थ और प्रबुद्ध समाज बनना है,
तो
पत्थरों पर दूध बहाने और चमत्कारिक ताबीजों के पीछे भागने की इस मध्यकालीन जहालत
को तिलांजलि देनी ही होगी। जब तक इस तरह के धार्मिक अपव्यय और पाखंड पर लगाम कसकर
हमारे विपुल संसाधनों को आधुनिक वैज्ञानिक शोध, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और लोक-स्वास्थ्य की ओर नहीं मोड़ा
जाएगा, तब तक एक गरिमापूर्ण
समाज की स्थापना ख्याली पुलाव ही बनी रहेगी।
हमारे यहाँ का एक तबका
यह दावा ठोकता है कि भारतीय संस्कृति विशुद्ध रूप से हिन्दू संस्कृति है और इसने
दुनिया को दिया है, किसी से कुछ लिया नहीं है। जबकि ऐतिहासिक हक़ीक़त इसके सर्वथा
उलट है। भाषाशास्त्र और इतिहास के पन्नों को पलटें तो हिन्दू शब्द ही प्राचीन
ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता; यह तो ईरानियों की भाषाई सीमा
की देन था जो सिंधु का सही उच्चारण न कर पाने के कारण इस पार के लोगों को हिन्दू कहने
लगे। सदियों के सफ़र में शक, हूण, ग्रीक,
पारसी, ईसाई और मुसलमान यहाँ आते रहे और इस
मिट्टी में घुल-मिलकर इसकी धड़कन बन गए। भारतीय संस्कृति कोई बंद पानी का ठहरा हुआ
तालाब न होकर एक प्रवहमान दरिया रही है जिसमें हर धारा ने अपनी पहचान का रंग घोला
है। हमारे खान-पान के आलू, टमाटर, मकई
से लेकर हमारे परिधानों की शेरवानी, कुर्ता-पायजामा और यहाँ
तक कि संघी शाखाओं की हाफ पैंट तक—सब इसी सांस्कृतिक लेन-देन और संकरण की उपज हैं।
संस्कृति के ताने-बाने
को अगर बारीकी से देखें, तो भारतीय संगीत, कला,
वास्तुकला और साहित्य में मुसलमानों की भूमिका को निकाल देने के बाद
भारत की कोई पहचान ही नहीं बचती। शास्त्रीय संगीत की महफ़िलों से लेकर आम गलियों
की कव्वाली तक—उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई, अमीर खुसरो
की खड़ी बोली, रसखान व रहीम के कृष्ण-भक्ति दोहे, और नज़ीर अकबराबादी से लेकर नज़रुल इस्लाम के श्यामा-संगीत तक—सब इस साझा
संस्कृति के जीवंत हस्ताक्षर हैं। देश के सत्तर फ़ीसदी से अधिक कुशल दस्तकार और
कारीगर—जो हथकरघा, ज़री, नक्काशी और
तामीर में माहिर हैं—मुस्लिम समुदाय से आते हैं और वे भारतीय अर्थव्यवस्था की असली
रीढ़ हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो मुसलमान अपने आचार-व्यवहार, हुनर और सुरों से खांटी भारतीय हैं, उनकी वफ़ादारी
पर संकीर्णतावादी सवाल उठाते हैं।
भावी समाज व्यवस्था का
आधार किसी संकीर्ण सांस्कृतिक शुद्धतावाद पर नहीं टिक सकता। संस्कृति को किसी एक
धर्म या गिरोह के दायरे में क़ैद करने की कोशिश समाज में सड़ांध और कूपमंडूक
मानसिकता ही पैदा करती है। हमें खुले दिल से यह स्वीकार करना होगा कि भारत
बहु-राष्ट्रीयताओं, बहु-भाषाओं और विविध सांस्कृतिक धाराओं का एक अनुपम संगम है।
जब तक हम इस मिली-जुली गंगा-जमुनी विरासत को सहजता से अपनी असली ताक़त नहीं
मानेंगे और शुद्धतावाद के खोखले दंभ से बाहर नहीं निकलेंगे, तब
तक एक सहिष्णु, जीवंत और एकीकृत समाज की बुनियाद नहीं रखी जा
सकती।
समाज के बौद्धिक
दिवालियापन की शुरुआत तब होती है जब वह तर्क और सवाल पूछने की स्वाभाविक मानवीय
प्रवृत्ति को ईश-निंदा या पाप करार
देकर कुचलने लगता है। हमारे यहाँ धर्म के अलंबरदारों ने यह मुगालता फैला रखा है कि
आस्था पर सवाल नहीं उठाए जा सकते,
जबकि
हकीकत यह है कि भारत की प्राचीन मेधा कभी अंधी आस्था की गुलाम नहीं रही। आज से ढाई
हज़ार साल पहले तथागत बुद्ध ने इसी धरती से उद्घोष किया था कि "किसी बात को केवल इसलिए
मत मान लो कि वह बहुत पुरानी है,
या
किसी धर्मग्रंथ में लिखी है, या मेरे जैसा
कोई बड़ा व्यक्ति कह रहा है; उसे पहले अपने
विवेक और तर्क की कसौटी पर कसो, और यदि वह
कल्याणकारी लगे तभी अंगीकार करो"। बुद्ध का यह अप्प दीपो भव का संदेश और चार्वाक का
लोकायत दर्शन—जो प्रत्यक्ष, भौतिक यथार्थ और
प्रकृति के नियमों को स्वीकार करता है—इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि भारत में
अनीश्वरवादी, भौतिकवादी चिंतन
की जड़ें कितनी गहरी और परिपक्व रही हैं।
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने
इस वैचारिक जंग को और धार देते हुए साफ़ लिखा था कि जो भी व्यक्ति प्रगति और बदलाव
का पक्षधर है, उसे हर उस रूढ़ि
और परंपरा को चुनौती देनी होगी जो इंसान को सोचने से रोकती है। भगत सिंह के अनुसार, अंधविश्वास इंसान के मस्तिष्क को मूढ़ और
प्रतिक्रियावादी बना देता है, इसलिए स्वतंत्र
विचारों को दबाने वाली हर व्यवस्था को खत्म होना ही चाहिए। आधुनिक दौर में जिन
असाध्य बीमारियों—चेचक, प्लेग, टीबी या पोलियो—से मानवता कराह रही थी, उनका इलाज किसी शीतला माता के हवन या मजारों
के ताबीज ने नहीं किया था, प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिकों की अथक साधना और तार्किक
अनुसंधानों से निकला है।
विपुल
संसाधनों और अपार मेधा से संपन्न होने के बावजूद आज भी हमारा समाज अगर वैश्विक
स्तर पर पिछड़ा हुआ है, तो इसकी एकमात्र
वजह यह है कि हमने आधुनिक युग में भी मध्यकालीन धार्मिक जुगाली को अपनी पहचान बना
रखा है। एक आधुनिक और सक्षम भारतीय समाज की संरचना तभी संभव है जब हमारी शिक्षा और
चिंतन का आधार पुराणों के चमत्कार या मौलवियों-पंडितों के फतवे न होकर विज्ञान की कार्य-कारण
पद्धति और मानवीय विवेक
बने। जब तक हम आकाश में बैठे काल्पनिक नियंता के भरोसे बैठने के बजाय इंसान की
अपनी सामूहिक शक्ति, तर्क और
वैज्ञानिक चेतना पर भरोसा नहीं करेंगे,
तब
तक वास्तविक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध ही रहेगा।
अब समय आ गया है कि एक
राष्ट्र के रूप में हम खुद से यह निर्मम सवाल पूछें कि हमारी वास्तविक राष्ट्रीय
प्राथमिकता क्या है—मन्दिर, मस्जिद और
कर्मकांडीय तमाशे या फिर करोड़ों नागरिकों की बुनियादी मानवीय जरूरतें ? विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि जिस देश में
साठ से सत्तर प्रतिशत आबादी को आज भी शुद्ध पेयजल, स्वच्छ शौचालय और न्यूनतम पोषण मयस्सर नहीं है, जहाँ केवल बीस-पच्चीस प्रतिशत लोग ही सही
मायने में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहे हैं,
वहाँ
धर्म के नाम पर हजारों करोड़ रुपये हर साल स्वाहा कर दिए जाते हैं। विद्रोही कवि
नज़रुल इस्लाम ने इस पाखंड पर कड़ा तमाचा जड़ते हुए पूछा था कि "क्या मन्दिर और मस्जिद
इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
मिट्टी
से बनी इमारतें तो फिर खड़ी हो सकती हैं,
लेकिन
जो इंसान दवा की एक बूंद, थोड़ा सा दूध और
रोटी के अभाव में तिल-तिल कर मर गया,
वह
कभी वापस नहीं लौट सकता"।
भारतीय संविधान के नीति
निर्देशक तत्वों में धारा 39(क) और 39(ङ) बहुत साफ शब्दों में यह संकल्प व्यक्त
करती हैं कि राज्य प्रत्येक नागरिक—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—को आजीविका के
पर्याप्त साधन, स्वास्थ्य, सम्मानजनक कार्यदशाएं और बालकों के सुकुमार
विकास के अवसर सुनिश्चित करेगा। लेकिन व्यवस्था के कर्णधारों ने संविधान के इस
समाजवादी और समतामूलक मर्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया, ताकि वे आम जनता का ध्यान बुनियादी हकों से
भटकाकर जाति और मजहब के अखाड़े में उलझाए रख सकें। अगर इन संवैधानिक संकल्पों को
ईमानदारी से ज़मीन पर उतारा गया होता,
तो
आज आज़ादी के इतने दशकों बाद भी देश की बहुसंख्यक जनता को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन
का दंश न झेलना पड़ता। इसके साथ ही,
संविधान
के अनुच्छेद 44 में दर्ज समान
नागरिक संहिता को बिना किसी संकोच या वोट-बैंक की मजबूरी के लागू किया जाना चाहिए
था, ताकि किसी भी धर्म की
आड़ में महिलाओं पर थोपी गई मध्यकालीन बर्बरता—चाहे वह बहुपत्नी प्रथा हो, एकतरफा तलाक हो या संपत्ति से बेदखली—पूरी
तरह खत्म हो सके।
भावी भारत की समाज
व्यवस्था का स्वरूप किसी काल्पनिक राम-राज्य या धार्मिक खिलाफत की संकीर्ण परिधि में नहीं समा सकता। इसका
ताना-बाना समता, सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति की बेबाक आज़ादी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वास्तविक कल्याणकारी
राज्य की ठोस ज़मीन पर ही बुना जा सकता है। जब तक हर हाथ को काम, हर सिर को छत, हर बच्चे को वैज्ञानिक शिक्षा और हर बीमार को मुफ़्त व
उम्दा इलाज नहीं मिल जाता, तब तक किसी भी
तथाकथित आध्यात्मिक श्रेष्ठता का ढिंढोरा पीटना एक सफेद झूठ और क्रूर मज़ाक के
सिवा कुछ नहीं है। जब भारत अपने अंधविश्वासों और धर्मान्धता की बेड़ियों को काटकर
मनुष्य और मानवीय जीवन
की गरिमा को अपनी
व्यवस्था के केंद्र में स्थापित करेगा, तभी वह एक
समतामूलक, सभ्य और वास्तव में
विकसित समाज के रूप में सिर उठाकर खड़ा हो सकेगा।
बहरहाल, अपनी बात को
ज्यादा न खींचते इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर
नहीं करता कि उसके पास कितने भव्य मंदिर,
मस्जिदें
या विशाल धर्मस्थल हैं, वह इस बात पर
निर्भर करता है कि उसका समाज अपने नागरिकों को कितनी मानवीय गरिमा, समानता और विचार की स्वतंत्रता प्रदान करता
है। इतिहास गवाह है कि धर्म और ईश्वर के नाम पर लड़े गए युद्धों और खींची गई
विभाजन रेखाओं ने इस देश को सिर्फ लहूलुहान करने के अलावा कुछ नहीं किया है। जब तक
हम आस्था के नाम पर जारी पाखंड, जातिगत दंभ और
छद्म सेक्युलरिज्म के घालमेल से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक समतामूलक समाज का स्वप्न अधूरा ही रहेगा।

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